Sahibganj – Manihari गंगा पुल निर्माण में देरी, वादे और वास्तविकता के बीच पसरा सन्नाटा

Delay in construction of Sahibganj–Manihari Ganga bridge, silence prevails between promise and reality

Sahibganj: झारखंड के साहिबगंज और बिहार के मनिहारी को जोड़ने वाला बहुप्रतीक्षित गंगा पुल अब देरी की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। यह पुल केवल दो राज्यों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना नहीं है, बल्कि यह पूर्व भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास की रीढ़ मानी जा रही है।

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या NH-133B के अंतर्गत लगभग 6 किलोमीटर लंबा यह पुल साहिबगंज (Sahibganj) को मनिहारी से सीधे जोड़ने का कार्य करेगा। इसके अलावा मनिहारी की ओर 16 किलोमीटर लंबा बायपास भी प्रस्तावित है। इस पूरे परियोजना की लागत ₹1,954 करोड़ आँकी गई थी। निर्माण कार्य का जिम्मा Dilip Buildcon Limited (DBL) और Hindustan Construction Company (HCC) के संयुक्त उपक्रम को सौंपा गया था। हालांकि इस पुल के निर्माण कार्य की गति शुरू से ही सुस्त रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पहले इसे अक्टूबर 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा था, जिसे अब बढ़ाकर दिसंबर 2025 कर दिया गया है। परंतु जमीनी हालात इसके भी पूरे होने की गवाही नहीं दे रहे।

गंगा नदी के बीचोंबीच पिलर निर्माण का कार्य अभी तक अधूरा पड़ा है। मानसून में गंगा का जलस्तर तेज़ी से बढ़ता है, जिससे नदी में पाइलिंग और अन्य निर्माण गतिविधियाँ लगभग ठप पड़ जाती हैं। जबकि दोनों ओर के अप्रोच रोड का काम पहले ही पूरा हो चुका है, मुख्य पुल की रचना अधर में लटकी हुई है।

स्थानीय प्रशासन और जानकार मानते हैं कि निर्माण एजेंसी DBL की धीमी कार्यप्रणाली इस देरी का बड़ा कारण रही है। पहले भी DBL पर कई परियोजनाओं में समयसीमा का पालन न करने के आरोप लग चुके हैं। साहिबगंज पुल के मामले में भी यह देखा जा रहा है कि काम की रफ्तार पर्याप्त नहीं है, खासकर बारिश के महीनों में।

पुल के जल्द निर्माण की उम्मीद में वर्षों से टकटकी लगाए बैठे स्थानीय लोग अब निराश हैं। साहिबगंज (Sahibganj) के व्यवसायियों से लेकर छात्रों और आम नागरिकों तक, सभी को इस पुल से बड़ी उम्मीदें हैं। यह न केवल यात्रा का समय घटाएगा, बल्कि बिहार और झारखंड के बीच व्यापार, परिवहन और सामाजिक संबंधों को भी मज़बूती देगा।

मंत्री गडकरी द्वारा बार-बार उद्घाटन की नई तिथि घोषित करना इस परियोजना के राजनीतिक महत्त्व को तो दर्शाता है, लेकिन तकनीकी प्रगति अब तक ठोस नतीजों से कोसों दूर है। निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय करने और कार्य की निगरानी के लिए NHAI को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

जहाँ एक ओर साहिबगंज-मनिहारी गंगा पुल पूर्वांचल के विकास का द्वार खोल सकता है, वहीं दूसरी ओर इसकी लंबी देरी आम जनता के धैर्य की परीक्षा बन चुकी है। यदि मौजूदा गति से काम जारी रहा, तो दिसंबर 2025 की समयसीमा भी एक और अधूरा वादा बनकर रह सकती है। शासन को चाहिए कि ठेकेदारों की जवाबदेही तय करे, और इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना को समयबद्ध तरीके से पूर्ण कराने की दिशा में सख्त कदम उठाए।

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WASIM AKRAM
Author: WASIM AKRAM

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