डीएमएफटी बना निर्माण निधि, कल्याण लक्ष्य से भटका Sahibganj

DMFT becomes a construction fund, deviating from its welfare objectives in Sahibganj.

Sahibganj: जिले में डीएमएफटी फंड के इस्तेमाल का पैटर्न एक असहज सच सामने रखता है, जहां खनन प्रभावितों की बुनियादी जरूरतें सबसे आगे होनी चाहिए थीं, वहीं जिला प्रशासन का पूरा फोकस फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और कंक्रीट निर्माण पर टिक गया। सवाल यह नहीं कि सड़क, नाला या इमारत जरूरी नहीं; सवाल यह है कि क्या ये कार्य पर्यावरण सुरक्षा, महिला एवं बाल कल्याण, स्वच्छता, पेयजल और स्वास्थ्य से भी ज्यादा जरूरी हैं? आंकड़े बताते हैं कि उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में योजनाएं या तो चुनी ही नहीं गईं, या चुनी गईं तो उनका क्रियान्वयन बेहद कमजोर रहा।

पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण, जिसकी जरूरत खनन-प्रभावित इलाकों में सबसे अधिक है, योजनाओं से लगभग गायब रहा। महिला एवं बाल कल्याण और स्वच्छता जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी प्रशासनिक प्राथमिकता से बाहर होते चले गए। इसके उलट, कंक्रीट आधारित निर्माण कार्यों में न सिर्फ योजनाओं की संख्या अधिक रही, बल्कि खर्च की गति भी तेज दिखाई दी। यह स्थिति नीति से विचलन का संकेत देती है।

डीएमएफटी और पीएमकेकेवाय का मूल उद्देश्य खनन से प्रभावित समुदायों को राहत देना है, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं, प्रदूषण से सुरक्षा, महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित-सशक्त वातावरण। लेकिन जमीन पर तस्वीर उलटी है। जहां सांस लेना मुश्किल है, वहां पर्यावरण योजनाएं शून्य हैं; जहां पानी संकट है, वहां खर्च नगण्य है; और जहां बच्चों व महिलाओं के लिए हस्तक्षेप चाहिए, वहां योजनाएं गायब हैं। इसके बावजूद कंक्रीट का विस्तार जारी है।

प्रशासनिक तर्क अक्सर दृश्यमान विकास का होता है, वह विकास जो दिखे, जिसकी तस्वीरें बनें, जिसका उद्घाटन हो। मगर सवाल यह है कि दृश्यमान विकास की इस दौड़ में क्या अदृश्य पीड़ा, प्रदूषण, बीमारी, पानी की कमी को जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है? क्या खनन प्रभावितों के अधिकारों से बड़ा कोई निर्माण कार्य हो सकता है? यह भी चिंता का विषय है कि नियम समयबद्ध पारदर्शिता की मांग करते हैं; वार्षिक प्रतिवेदन, ऑडिट, सार्वजनिक प्रकटीकरण और विधानसभा के समक्ष प्रस्तुतिकरण। जब जवाबदेही की ये कड़ियां कमजोर पड़ती हैं, तब प्राथमिकताएं भटकती हैं और फंड का रुख बदल जाता है। परिणामस्वरूप, अधिकार-आधारित कल्याण की जगह परियोजना-आधारित निर्माण हावी हो जाता है।

आज सवाल प्रशासन से सीधे हैं, क्यों पर्यावरण सुरक्षा, महिला एवं बाल कल्याण और स्वच्छता को पीछे धकेला गया? क्यों खनन प्रभावितों के हक पर कंक्रीट को तरजीह मिली? और कब नीति की राह पर लौटेगा डीएमएफटी? जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक साहिबगंज में विकास का यह मॉडल कल्याण नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं के संकट का प्रतीक बना रहेगा।

ये भी पढ़ें: DMFT का भटका एजेंडा: Sahibganj में 2023-24 में भी कंक्रीट भारी; पर्यावरण, महिला-बाल कल्याण और स्वच्छता पूरी तरह गायब

WASIM AKRAM
Author: WASIM AKRAM

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