Pakur: लोटामारा क्षेत्र में डीबीएल कंपनी द्वारा की जा रही कोयला रैक लोडिंग अब केवल एक औद्योगिक गतिविधि नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही के अभाव की तस्वीर बनती जा रही है। लगातार सामने आ रही तस्वीरें और स्थानीय लोगों की शिकायतें यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि आखिर डीबीएल कंपनी को खुलेआम प्रदूषण फैलाने की छूट किसने दे रखी है? कोयला लोडिंग के दौरान धूल नियंत्रण के नियमों की अनदेखी, बिना पर्याप्त पानी छिड़काव के रैक लोडिंग और खुले डब्बों से उड़ती धूल ने पूरे इलाके को प्रदूषण की चपेट में ला दिया है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग आखिर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यदि कोल यार्ड में धूल नियंत्रण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, तो यह सीधा उल्लंघन है। इसके बावजूद न तो निरीक्षण की खबर सामने आ रही है और न ही किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी मिल रही है। इससे लोगों के बीच यह धारणा गहराने लगी है कि क्या प्रशासन की प्राथमिकता केवल खनन रॉयल्टी और राजस्व तक सीमित रह गई है।
रेलवे की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। रैक लोडिंग के दौरान ओवरलोडिंग, प्रोफाइलिंग में गड़बड़ी और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के बावजूद रेलवे द्वारा अब तक कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाया गया। नियमों के अनुसार अनियमित लोडिंग पाए जाने पर रैक को रोका जा सकता है और संबंधित एजेंसी पर कार्रवाई हो सकती है, लेकिन पाकुड़ में ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या रेलवे को केवल मालगाड़ियों से होने वाले मुनाफे से मतलब है, न कि उससे प्रभावित आम जनता और पर्यावरण से।
कोयले की धूल से सबसे अधिक प्रभावित लोटामारा गांव के ग्रामीण हैं। सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, खेतों और फसलों पर धूल जम रही है और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। आम जनजीवन और पर्यावरण दोनों पर इसका सीधा दुष्प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं दिख रहा।
अब स्थिति यह बन गई है कि सवाल केवल डीबीएल कंपनी की कार्यप्रणाली का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता का है। क्या प्रशासन तभी जागेगा जब हालात और बिगड़ जाएंगे, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद कार्रवाई की जाएगी। आम लोग यह जानना चाहते हैं कि कब जिला प्रशासन, प्रदूषण विभाग और रेलवे अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे और कब प्रदूषण फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक यह सवाल गूंजता रहेगा कि क्या पाकुड़ में उद्योगों को जनता और पर्यावरण से ऊपर रख दिया गया है।
मामले में आधिकारिक बयान हेतु उपायुक्त मनीष कुमार से दूरभाष पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक संपर्क नहीं हो पाया।
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