Sahibganj: खनन से प्रभावित पंचायतों और गांवों के कल्याण के लिए बनाए गए डीएमएफटी फंड का साहिबगंज जिले में जिस तरह उपयोग किया गया, वह नीति, उद्देश्य और न्याय तीनों पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (पीएमकेकेकेवाय) के तहत जिले में बरहरवा, पतना, राजमहल, बोरियो, बरहेट, मंडरो और तालझारी अंचल के कुछ पंचायतों व गांवों को खनन प्रभावित मानते हुए चिन्हित किया गया है, जबकि साहिबगंज सदर अंचल, साहिबगंज नगर परिषद, राजमहल नगर पंचायत और बरहरवा नगर पंचायत को स्पष्ट रूप से खनन प्रभावित क्षेत्र की सूची से बाहर रखा गया है। इसके बावजूद डीएमएफटी साहिबगंज के वित्तीय वर्ष 2023-24 के वार्षिक प्रतिवेदन से यह तथ्य सामने आया है कि खनन प्रभावित सूची से बाहर के सदर अंचल और नगर परिषद क्षेत्रों में सैकड़ों योजनाओं को डीएमएफटी समिति द्वारा स्वीकृति दी गई। यह वही फंड है, जिसका उद्देश्य खनन से उजड़े गांवों को राहत देना था, न कि गैर-प्रभावित शहरी और अर्धशहरी इलाकों में सौंदर्यीकरण और भवन निर्माण कराना।
29 सितंबर 2023 को तत्कालीन उपायुक्त की अध्यक्षता में हुई डीएमएफटी शासी परिषद की बैठक में 14 बिंदुओं पर चर्चा के बाद वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए कई योजनाओं को सर्वसम्मति से पारित किया गया। कागजों में इसे जनहित बताया गया, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इन कथित जनहित योजनाओं का बड़ा हिस्सा खनन प्रभावित क्षेत्रों से बाहर रहा। सदर प्रखंड को खनन प्रभावित सूची में शामिल न होने के बावजूद हाजीपुर दियारा में सामुदायिक भवन निर्माण, गंगा प्रसार पूरब मध्य में जर्जर पंचायत भवन का निर्माण, शोभनपुर भट्ठा और बड़ी कोदरजन्ना चौक पर हाई मास्क लाइट का अधिष्ठापन, कारगिल दियारा में सामुदायिक भवन, नगर परिषद क्षेत्र के नया टोला वार्ड 19 में सामुदायिक भवन, तथा नमामि गंगे परियोजना से बने मदन मोहन मालवीय गंगा घाट के सौंदर्यीकरण जैसे कार्य डीएमएफटी फंड से स्वीकृत किए गए। यही नहीं, ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जहां योजनाएं खनन प्रभावित क्षेत्र से बाहर चुन ली गईं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि वार्षिक प्रतिवेदन 2023-24 के अनुसार कई ऐसे पंचायतों में पेयजल योजनाएं स्वीकृत की गईं, जिनका खनन से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है और जो प्रभावित सूची में शामिल ही नहीं हैं। दूसरी ओर, खनन प्रभावित गांवों के लोग आज भी पीने के पानी को तरस रहे हैं। जिन इलाकों में खनन से जलस्रोत सूख चुके हैं, हवा जहरीली हो चुकी है और जीवन संकट में है, वहां एक भी प्रभावी योजना नहीं दिखती। यह स्थिति साफ संकेत देती है कि डीएमएफटी साहिबगंज की तत्कालीन समिति ने फंड के मूल उद्देश्य को ही पलट दिया। जिन पंचायतों और गांवों के विकास व कल्याण के लिए यह फंड बनाया गया था, उन्हें हाशिये पर धकेल कर योजनाएं मनमाने ढंग से गैर-प्रभावित क्षेत्रों में स्वीकृत और पूर्ण कराई गईं।
अब सवाल यह है कि क्या डीएमएफटी फंड खनन प्रभावितों का हक़ है या प्रशासनिक सुविधा का साधन बन गया है? क्या तत्कालीन समिति ने जानबूझकर नीति से भटककर निर्णय लिए, या फिर खनन प्रभावितों की पीड़ा को महत्वहीन मान लिया गया? जिस फंड को न्याय और राहत का माध्यम होना था, वही अगर गलत दिशा में बहने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय बन जाता है। साहिबगंज में डीएमएफटी फंड के इस इस्तेमाल ने यह साफ कर दिया है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और नीति के अनुरूप सख्ती से निर्णय नहीं लिए जाएंगे, तब तक खनन प्रभावित पंचायतों के लिए बना यह फंड उनके जीवन में बदलाव लाने के बजाय कागजों और कंक्रीट में ही सिमटा रहेगा
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