Sahibganj/Godda: गोड्डा लोकसभा से भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे द्वारा 2 जुलाई 2025 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर किया गया एक पोस्ट विवादों में आ गया है। अपने ट्वीट में सांसद दुबे ने 1855 के हूल विद्रोह के नायक सिद्धो-कान्हू के वंशज मंडल मुर्मू को लेकर झारखंड सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पुलिस रिपोर्ट आने से पहले ही मंडल मुर्मू के कार्यक्रम को रोकने का आदेश जारी कर दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार आदिवासी समुदाय को दबाने का प्रयास कर रही है।
सांसद निशिकांत दुबे के ट्वीट में एक गोपनीय पत्र की प्रति भी साझा की गई है, जो अनुमंडल पदाधिकारी, साहिबगंज द्वारा जारी किया गया है। पत्र का ज्ञापांक III-19/2025 – 411, दिनांक 23 जून 2025 है, जिसमें मंडल मुर्मू द्वारा सिद्धो-कान्हू हूल फाउंडेशन के बैनर तले भोगनाडीह में आयोजित हूल दिवस समारोह के लिए अनुमति नहीं देने की बात कही गई है। पत्र में इसका कारण मुख्यमंत्री के प्रस्तावित कार्यक्रम की सुरक्षा बताते हुए थाना व अंचल कार्यालय द्वारा दी गई संयुक्त जांच रिपोर्ट (पत्रांक संख्या 280/281) को आधार बनाया गया है, जिसकी तिथि 25 जून 2025 अंकित है।
सांसद निशिकांत दुबे ने इस तिथि को आधार बनाते हुए लिखा, “रिपोर्ट 25 जून को मिली और झारखंड सरकार ने विरोध पत्र 23 जून को ही जारी कर दिया। खाता न बही जो सरकार यानी आदिवासी समाप्त।”
1855 के हूल विद्रोह के नायक सिदो कानो के वंशज मंडल मुरमू के पुलिस अत्याचार की कहानी @INCIndia की ज़बानी ।रिपोर्ट 25 जून को मिली और झारखंड सरकार ने विरोध पत्र 23 जून को ही जारी कर दिया ।खाता ना बही जो ……..।सरकार यानि आदिवासी समाप्त pic.twitter.com/aAmw4KYusG
— Dr Nishikant Dubey (@nishikant_dubey) July 2, 2025
हालांकि, मामला सामने आने के बाद साहिबगंज अनुमंडल पदाधिकारी ने सांसद के दावे को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि उक्त पत्र में टाइपिंग मिस्टेक हुई है। उन्होंने कहा कि संयुक्त जांच प्रतिवेदन 20 और 21 जून को ही प्राप्त हो गया था, लेकिन कंप्यूटर ऑपरेटर द्वारा इसे टाइप करते समय गलती से 25 जून अंकित कर दिया गया।
एसडीओ ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्र की मंशा किसी भी आदिवासी समुदाय या व्यक्तित्व का दमन नहीं है, बल्कि मुख्यमंत्री के दौरे की सुरक्षा एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक समन्वय सुनिश्चित करने की दृष्टि से अनुमति नहीं दी गई थी।
प्रशासन की ओर से जांच प्रतिवेदन की सही प्रति भी सार्वजनिक की गई है, जिसमें प्रतिवेदन की वास्तविक तिथि 20-21 जून दर्शाई गई है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि संवेदनशील मामलों में जनप्रतिनिधियों को पूरी तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के बाद ही वक्तव्य देना चाहिए, ताकि आम जनता में भ्रम या असंतोष की स्थिति उत्पन्न न हो। सांसद दुबे द्वारा सोशल मीडिया पर बिना प्रशासनिक पक्ष की पुष्टि किए किया गया यह पोस्ट न केवल भ्रामक सिद्ध हुआ, बल्कि इससे आदिवासी समाज में अनावश्यक तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती थी।
इस पूरे प्रकरण को लेकर झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झामुमो और विपक्षी भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। जहां भाजपा इसे आदिवासी अस्मिता से जोड़कर बड़ा मुद्दा बना रही है, वहीं प्रशासन और राज्य सरकार इसे एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया व टाइपिंग त्रुटि बता रही है।
हूल दिवस जैसे ऐतिहासिक और संवेदनशील आयोजन पर उठे इस विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे प्रतिनिधियों को तथ्यों की पुष्टि के बाद ही कोई भी वक्तव्य या पोस्ट सार्वजनिक करना चाहिए, खासकर तब जब मामला समुदाय विशेष की भावनाओं से जुड़ा हो। इस मामले ने यह भी दर्शाया कि एक छोटी सी टाइपिंग गलती बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे सकती है।
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