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झारखंड-बंगाल सीमा पर दर्दनाक हादसा, गंगा में डूबी सवारी नाव, 2 लापता 2 का शव बरामद
Sahibganj: एक ओर देश अमृतकाल की बात करता है, दूसरी ओर झारखंड के आदिम जनजातीय समुदाय के लोग आज भी अपनी भूख मिटाने के लिए चूहों पर निर्भर हैं। शनिवार की सुबह जब गंगा की लहरों ने महाराजपुर गदाई दियारा में एक नाव को निगल लिया, तब उसमें सवार लोग सिर्फ सैर नहीं कर रहे थे, वे चूहा पकड़ने निकले थे, ताकि घर का चूल्हा जल सके। इस हादसे में दो युवकों की मौत हो चुकी है और दो अब भी लापता हैं। यह दुर्घटना नहीं, व्यवस्था की विफलता है, जो आज भी हाशिए के समाज को सबसे खतरनाक हालात में जीने को मजबूर कर रही है। जब यात्रियों से भरी एक नाव गंगा नदी में डूबी, तो उसमें सवार 32 में से 28 लोग किसी तरह तैर कर जान बचा पाए। लेकिन चार लोग डूब गए।
नाव पर सवार अधिकतर लोग झारखंड के आदिम जनजातीय समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। वे पारंपरिक तरीकों से चूहा पकड़ने दियारा क्षेत्र जा रहे थे। इनमें से कई रांगा थाना क्षेत्र अंतर्गत झूमर बांध एवं आसपास के इलाके के रहने वाले हैं, जो शायद जंगल-जंगल घूमकर चूहे पकड़ने का काम करते हैं।। एक ग्रामीण राम किस्कू ने कहा, हम कुल 17 लोग थे। हर साल बारिश के मौसम में इस ओर चूहे पकड़ने आते हैं। इस बार गंगा ने हमें लील लिया। दो चले गए… दो अब भी नहीं मिले।
क्या चूहा, हो सकता है रोटी का विकल्प?
यह बात कड़वी है, लेकिन सच है। देश ने 75 सालों में कितनी ही योजनाएं चलाईं, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, हर घर अन्न योजना, पोषण मिशन, वनाधिकार कानून, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम। लेकिन क्या कभी किसी ने यह सोचा कि जो आदिवासी है, जिनकी जड़ें जंगलों में हैं, क्या वे आज भी भोजन के लिए जीविका की सबसे नीचली कड़ी पर टिके हुए हैं? सवाल यह नहीं है कि कोई चूहा खाता है या नहीं। सवाल यह है कि अगर कोई इंसान 2025 में भी ज़िंदा रहने के लिए चूहे पकड़ने को मजबूर है, तो क्या हमारी योजनाएं, हमारे आंकड़े, हमारे विकास का दावा कहीं खोखला नहीं हो जाता?
इस घटना ने एक बार फिर बता दिया कि झारखंड के सुदूर गांवों में आज भी लोगों के पास चूहे, पेट भरने का साधन है। न शिक्षा, न रोजगार, न वैकल्पिक पोषण। यही तो है वह असली आज़ादी का भूख से सामना। आज दो लोग लापता हैं। शायद गंगा की धारा उन्हें भी अपने गर्भ में समा चुकी हो। लेकिन ये सिर्फ लोग नहीं हैं, ये वे चेहरे हैं जो हमें आईना दिखाते हैं कि अब भी इस देश में एक तबका ज़िंदा रहने के लिए रोज़ मौत से खेलते हैं।
आखिर कब तक चूहे इंसान की थाली में रहेंगे? कब तक आदिवासी समुदाय की भूख योजनाओं की फुटनोट बनकर रह जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल है कि गंगा ने दो युवक की जान ले ली, लेकिन क्या हमारे सिस्टम की आत्मा अब भी बची है? जिस नाव पर वे लोग सवार थे, वह संतुलन खो बैठी। आखिर क्यों? क्या वह नाव ओवरलोड थी? क्या उसकी जांच हुई थी? क्या प्रशासन ने कभी यह समझने की कोशिश की कि लोग गंगा पार क्यों कर रहे हैं, वह भी जान जोखिम में डालकर?

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