Pakur: रेलवे रैक से कोयला ढुलाई में नियमों की अनदेखी को लेकर प्रकाशित खबर के बाद जब शनिवार को WM 24×7 News की टीम पाकुड़ स्थित डीबीएल कंपनी के कोल लोडिंग साइडिंग पहुंची, तो वहां का दृश्य चौंकाने वाला और बेहद चिंताजनक पाया गया। पूरे कोल यार्ड और लोडिंग क्षेत्र में चारों ओर कोयले की महीन धूल फैली हुई थी। जमीन, मशीनें, रेल वैगन, सड़क और आसपास का वातावरण पूरी तरह काले धूलकणों से ढका नजर आया। वहां की स्थिति यह साफ संकेत दे रही थी कि कोयला रैक लोडिंग से जुड़े राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) और प्रदूषण नियंत्रण नियमों का यहां खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
टीम ने पाया कि ट्रकों से कोल यार्ड में कोयला डंपिंग के समय एवं मालगाड़ियों के खुले डब्बों में कोयला लोड करते वक्त पानी के छिड़काव या डस्ट सप्रेशन की कोई प्रभावी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। पूरे लोडिंग क्षेत्र में हवा के साथ कोयले की धूल उड़ती दिखी, जिससे वहां खड़े रहना भी मुश्किल हो गया। नियमों के अनुसार कोयला लोडिंग के दौरान निरंतर वॉटर स्प्रिंकलिंग या मिस्ट स्प्रे सिस्टम का संचालन अनिवार्य है, ताकि धूल उड़ान को नियंत्रित किया जा सके, लेकिन डीबीएल के कोल यार्ड में इसका पालन होता नजर नहीं आया।

कोल साइडिंग परिसर में लगी फॉगिंग मशीन केवल शोभा की वस्तु बनाकर रखी गयी थी। मशीन मौजूद होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं किया जा रहा था। पानी का छिड़काव केवल उस सड़क मार्ग पर किया जा रहा था, जहां से ट्रकों का आवागमन हो रहा था, जबकि वास्तविक प्रदूषण का केंद्र, कोयला डंपिंग और रेल वैगन लोडिंग स्थल, पूरी तरह उपेक्षित था। यही नहीं, खुले डब्बों में कोयला भरते समय न तो धूल नियंत्रण के उपाय अपनाए जा रहे हैं और न ही यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोयला निर्धारित लोडिंग स्तर के भीतर रहे।

पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के दिशानिर्देशों के अनुसार कोयला लोडिंग एवं परिवहन को प्रदूषणकारी गतिविधि माना गया है। इन नियमों के तहत लोडिंग प्वाइंट पर डस्ट सप्रेशन सिस्टम, नियमित पानी का छिड़काव, कोयले की समतल प्रोफाइलिंग और हवा में उड़ने वाले धूलकणों पर नियंत्रण अनिवार्य है। विशेष रूप से आबादी वाले इलाकों के समीप स्थित कोल साइडिंग में अतिरिक्त सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद डीबीएल कंपनी के कोल यार्ड में इन सभी प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी की जा रही थी।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भी अपने कई आदेशों में स्पष्ट किया है कि कोयला रैक लोडिंग और परिवहन के दौरान धूल उड़ान को रोकना संबंधित कंपनी और रेलवे प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी है। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा है कि यदि कोयला ढुलाई से आसपास की आबादी के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो इसे गंभीर उल्लंघन मानते हुए दोषी इकाई पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जा सकती है। इसके बावजूद डीबीएल कंपनी के कोल लोडिंग साइडिंग में हालात यह दर्शाते हैं कि एनजीटी के आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

स्थानीय लोगों और मजदूरों के स्वास्थ्य पर इस लापरवाही का सीधा असर पड़ने की आशंका है। कोयले की महीन धूल लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाने से अस्थमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। कोल यार्ड के आसपास बसे इलाकों के लिए यह स्थिति एक धीमे जहर की तरह काम कर रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नियम, मशीनें और दिशा-निर्देश मौजूद हैं, तो फिर उनका पालन डीबीएल कंपनी द्वारा क्यों नहीं किया जा रहा। कोयला देश की ऊर्जा जरूरतों का अहम स्रोत है, लेकिन उसके नाम पर पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य से खुला खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। डीबीएल कंपनी द्वारा कोयला रैक लोडिंग के दौरान अपनाई जा रही यह कार्यप्रणाली न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के भी विपरीत है।
अब निगाहें जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और रेलवे प्रशासन पर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह लापरवाही आने वाले समय में एक बड़े पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है।
ये भी पढ़ें: Sahibganj में डीएमएफटी फंड का दुरुपयोग? खनन प्रभावित इलाकों को नज़रअंदाज़ कर रही जिला प्रशासन?









