Sahibganj: जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट, साहिबगंज के वार्षिक प्रतिवेदन 2023-24 में संलग्न 29 सितंबर 2023 को हुई शासी परिषद की बैठक का कार्यवृत्त यदि गौर से पढ़ा जाए, तो यह सवाल अपने-आप खड़ा होता है कि क्या यह बैठक खनन प्रभावितों के लिए थी या महज विभागीय शिकायतों और प्रशासनिक निर्देशों की खानापूर्ति भर। बैठक की अध्यक्षता तत्कालीन डीसी ने की और इसमें तत्कालीन बोरियो विधायक लोबिन हेम्ब्रम सहित तत्कालीन जिला परिषद अध्यक्ष, राजमहल सांसद प्रतिनिधि, तत्कालीन राजमहल विधायक प्रतिनिधि, तत्कालीन पाकुड़ विधायक प्रतिनिधि, विभिन्न विभागों से उपस्थित सभी पदाधिकारियों एवं खनन प्रभावित प्रखंड के प्रमुख, उपप्रमुख तथा खनन प्रभावित पंचायत के मुखिया एवं उप मुखिया शामिल थे।, लेकिन 14 बिंदुओं की लंबी कार्यसूची में खनन से उजड़े जीवन, प्रदूषण, स्वास्थ्य संकट और सामाजिक-आर्थिक क्षति जैसे मूल मुद्दे कहीं दिखाई नहीं देते।
बैठक के पहले ही बिंदु में पीएमकेकेकेवाय के तहत खनन प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और आधारभूत संरचना के विकास की बड़ी-बड़ी बातें की गईं। सदस्यों को यह भी बताया गया कि उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में 60 प्रतिशत और निम्न प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में 40 प्रतिशत राशि खर्च की जानी है। लेकिन इसके बाद जिन 13 बिंदुओं पर चर्चा हुई, वे इस दावे की सच्चाई खुद उजागर कर देते हैं।
दूसरे बिंदु में तालझारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के जर्जर भवन को लेकर नाराजगी जताई गई, तीसरे और चौथे बिंदु में वाहनों की गति सीमा, साइन बोर्ड और बिना तिरपाल ढंके ट्रकों से उड़ती धूल पर चिंता दिखाई गई। सवाल यह है कि यदि धूल-प्रदूषण की इतनी ही फिक्र थी, तो जिले में पत्थर खदानों, क्रशर और रैक लोडिंग से फैल रहे स्थायी सफेद ज़हर पर चर्चा क्यों नहीं हुई? खनन प्रभावित गांवों में सांस की बीमारियां, त्वचा रोग और जलस्रोतों के दूषित होने का मुद्दा एजेंडे से क्यों गायब रहा?
पांचवें, सातवें और आठवें बिंदु में बरसात से सड़कों पर जमा मिट्टी, खेतों में बहती खदान की मिट्टी और सड़क किनारे झाड़ियों से होने वाली दुर्घटनाओं की बात हुई। इनमें कहीं भी यह स्वीकार नहीं किया गया कि यह सब अनियंत्रित खनन और कमजोर निगरानी का प्रत्यक्ष परिणाम है। किसानों की फसल बर्बाद होने पर मुआवजे की बात तो की गई, लेकिन भविष्य में ऐसी क्षति रोकने की कोई ठोस नीति या योजना बैठक में सामने नहीं आई। आदिवासी पीजी हॉस्टल की मरम्मत, मिल्क पार्लर भवन में स्थानीय व्यक्ति को रखने और कोविड काल की वायरोलॉजी लैब के कर्मियों की प्रतिनियुक्ति जैसे मुद्दे भी एजेंडे में शामिल रहे। ये सभी प्रशासनिक या विभागीय विषय हैं, जिनका डीएमएफटी के मूल उद्देश्य खनन प्रभावितों के समग्र पुनर्वास और संरक्षण से सीधा संबंध नहीं बनता।
सबसे चौंकाने वाली बात है कि पूरे 14 बिंदुओं में कहीं भी खनन से विस्थापित परिवारों, प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण पुनर्स्थापन, महिलाओं-बच्चों के स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल या आजीविका के वैकल्पिक साधनों पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई। न तो खनन प्रभावित ग्राम सभाओं की वास्तविक जरूरतों का आकलन दिखता है और न ही यह संकेत मिलता है कि डीएमएफटी फंड का उपयोग उन समस्याओं पर केंद्रित है, जिनके लिए यह ट्रस्ट बना ही था। ये सभी विषय अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या डीएमएफटी जैसी संस्था की शासी परिषद की बैठकें इन्हीं विषयों तक सीमित रहने के लिए होती हैं?
ऐसे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि तत्कालीन डीएमएफटी शासी परिषद ने बैठकें तो कीं, लेकिन बातें अपनी सहूलियत की कीं खनन प्रभावितों की नहीं। कागज़ों में करोड़ों की योजनाएं, प्रतिशतों की गणना और वार्षिक प्रतिवेदन भले पूरे हों, ज़मीन पर खनन प्रभावित आज भी राहत के नाम पर ठगे हुए महसूस करते हैं। डीएमएफटी का उद्देश्य यदि वास्तव में जनहित है, तो भविष्य की बैठकों में एजेंडा बदलना होगा वरना यह ट्रस्ट भी सिर्फ़ फाइलों में चलने वाली एक और सरकारी संस्था बनकर रह जाएगा।









