Sahibganj: संथाल परगना के चाणक्य कहे जाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सचिव सह प्रवक्ता पंकज मिश्रा इन दिनों अपनी दूरदर्शी सोच और सधी हुई रणनीति को लेकर लगातार चर्चा में हैं। साहिबगंज और पाकुड़ जिले में रेल से जुड़े विकास कार्यों को लेकर उन्होंने जो तरीका अपनाया है, उसकी न केवल राजनीतिक गलियारों में बल्कि आम लोगों के बीच भी खुलकर सराहना हो रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों बाद किसी जनप्रतिनिधि ने रेलवे से हक लेने के लिए ऐसा रास्ता चुना है, जिसमें जनता को सड़क या रेल ट्रैक पर उतरने की मजबूरी भी नहीं और रेलवे के मुकदमों का डर भी नहीं। स्थानीय लोगों का अनुभव रहा है कि इससे पहले साहिबगंज और पाकुड़ में ट्रेनों के ठहराव, नई ट्रेनों की मांग, रेल ओवरब्रिज और अन्य रेलवे विकास कार्यों को लेकर कई आंदोलन हुए। रेल रोको जैसे आंदोलनों में आम लोग आगे किए गए, आंदोलनकारियों पर केस दर्ज हुए और अंत में रेलवे की ओर से सिर्फ आश्वासन ही हाथ लगा। विकास के नाम पर फाइलें चलीं, लेकिन जमीन पर नतीजा नहीं दिखा।
इसी पृष्ठभूमि में पंकज मिश्रा ने इस बार अलग राह चुनी। दिसंबर 2025 में मालदा रेल मंडल के डीआरएम के साथ जिला समाहरणालय में हुई बैठक में उन्होंने साहिबगंज से जुड़े रेल विकास, ट्रेनों के ठहराव, ट्रेनों के विस्तारीकरण और साहिबगंज के पूर्वी व पश्चिमी रेल फाटक पर रेल ओवरब्रिज निर्माण को लेकर मांगपत्र सौंपा। लेकिन केवल आश्वासन पर संतुष्ट होने के बजाय उन्होंने साफ शब्दों में रेलवे को चेताया कि यदि आरओबी निर्माण को लेकर ठोस पहल नहीं हुई, तो आंदोलन होगा।
यह आंदोलन पारंपरिक नहीं, बल्कि पूरी तरह रणनीतिक है। पंकज मिश्रा ने चाणक्य नीति का प्रयोग करते हुए रेलवे को सीधे आर्थिक मोर्चे पर घेरने का फैसला किया। साहिबगंज और पाकुड़ जिले से पत्थर रैक लोडिंग को पूरी तरह ठप करने और अग्रिम रेल रैक बुकिंग रोकने का आह्वान कर उन्होंने रेलवे की उस नस पर हाथ रखा, जहां रोज़ाना करोड़ों रुपये का राजस्व जुड़ा है। खास बात यह है कि इस रणनीति में न रेल रोको है, न ट्रैक जाम और न ही ऐसा कोई कदम, जिससे आंदोलनकारियों पर रेलवे की ओर से कानूनी कार्रवाई की गुंजाइश बने।
लोगों का कहना है कि यह पहली बार है जब किसी नेता ने जनता को आगे कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के बजाय, घर बैठे रेलवे को नतमस्तक करने की ठोस योजना बनाई है। इस मास्टर स्ट्रोक का असर भी दिखने लगा है। साहिबगंज और पाकुड़ के पत्थर व्यवसायियों ने खुलकर इस रणनीति का समर्थन किया है और आंदोलन के साथ खड़े होने की घोषणा की है। व्यवसायियों का मानना है कि यह लड़ाई किसी दल की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के अधिकार और विकास की है।
दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपनाई गई इस नीति ने पंकज मिश्रा को क्षेत्र में एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है, जो टकराव नहीं, बल्कि रणनीति से परिणाम निकालने में विश्वास रखता है। साहिबगंज और पाकुड़ के लोगों को उम्मीद है कि इस बार रेलवे को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस फैसले लेने होंगे और यही पंकज मिश्रा की ‘चाणक्य नीति’ की सबसे बड़ी जीत मानी जा रही है।
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