Howrah रेल मंडल के Pakur में कोयला ढुलाई नियमों की अनदेखी, आबादी वाले इलाकों में बढ़ता धूल प्रदूषण बना गंभीर खतरा

Pakur: Negligence of rules in coal transportation in the Howrah railway division, increasing dust pollution in populated areas poses a serious threat.

Pakur: रेलवे ट्रैक से गुजरती कोयला लदी मालगाड़ियों का दृश्य अब आम हो गया है, लेकिन इन गाड़ियों की हालत और उनमें भरे कोयले का स्तर एक गम्भीर पर्यावरणीय खतरे की ओर संकेत करता है। हावड़ा रेल मंडल के पाकुड़ रेलवे स्टेशन पर हाल ही की तस्वीरों में साफ दिखाई देता है कि ओपन वैगन में कोयला निर्धारित ऊँचाई से कहीं अधिक भर दिया गया है। कई डब्बों में तो कोयले के ढेर साइड-वाल से ऊपर तक उभरते नजर आ रहे हैं, जो न केवल भारतीय रेलवे के लोडिंग मानकों का खुला उल्लंघन है बल्कि उससे उड़ने वाले धूलकण से लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी संकट का कारण बन रहा है।

भारतीय रेलवे और आरडीएसओ द्वारा तय नियमों के अनुसार ओपन वैगन में कोयले की ढुलाई करते समय लैशिंग लेवल का पालन अनिवार्य है। इसके तहत वैगन की निर्धारित ऊँचाई से ऊपर तक माल भरना प्रतिबंधित है और ऊपरी सतह को समतल कर देना जरूरी होता है, ताकि सफर के दौरान कोयला गिरकर ट्रैक या स्टेशन परिसर में बिखरे नहीं। लेकिन वास्तव में हो इसका उल्टा रहा है। कोयले से लदे डब्बे ऊपर तक ठूँसे हुए हैं और प्रोफाइलिंग के नाम पर कोई मानक प्रक्रिया का पालन भी नहीं दिखता। यह स्थिति न सिर्फ नियमों के खिलाफ है बल्कि रेलवे सुरक्षा के लिहाज से भी अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि ओवरफिलिंग के कारण कोयला चलते समय ट्रैक पर गिरता है जिससे प्वाइंट, सिग्नलिंग और रेल उपकरणों में बाधा उत्पन्न होती है और कई बार दुर्घटनाओं की वजह भी बनता है।

समस्या यहीं खत्म नहीं होती। खुले वैगन में बिना ढके कोयले की ढुलाई से भारी मात्रा में कोयले की धूल हवा में फैलती है, जो मालगाड़ी की रफ्तार बढ़ते ही आसपास की बस्तियों तक पहुँच जाती है। यह धूलकण बेहद महीन होते हैं और शरीर में पहुँचकर सीधे फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। चिकित्सकों की माने तो लंबे समय तक कोयला धूल के संपर्क में रहने से अस्थमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। रेलवे लाइन के किनारे बसे मोहल्लों में रहने वाले लोगों के बीच ऐसी समस्याओं के होने की सम्भावना लगातार बढ़ रही हैं।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कोयला ढुलाई को लेकर साफ दिशानिर्देश जारी कर रखे हैं। इनके तहत कोयला लोडिंग के दौरान धूल को नियंत्रित रखने के लिए पानी का छिड़काव अनिवार्य है, बड़े कोल यार्ड और खदान क्षेत्रों में आधुनिक डस्ट सप्रेशन सिस्टम की व्यवस्था होनी चाहिए और आबादी वाले इलाकों से गुजरने वाली रेक के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने के निर्देश हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इन नियमों का पालन शायद ही कहीं दिखाई देता है। लोडिंग पॉइंट पर पानी छिड़काव की व्यवस्था कागजों तक सीमित रह गई है और खुले डब्बों में बिना किसी ढकाव के कोयला ढोना एक आम प्रथा बन चुकी है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) भी कई बार कोयला परिवहन से उत्पन्न प्रदूषण पर चिंता जता चुका है। ट्रिब्यूनल ने अपने आदेशों में स्पष्ट कहा है कि कोयले की ढुलाई से होने वाली धूल उड़ान एक गंभीर पर्यावरणीय खतरा है और इसके नियंत्रण के लिए रेलवे और खदान प्रबंधन दोनों को सख्त कदम उठाने होंगे। लेकिन तस्वीरें बताती हैं कि जमीन पर इन आदेशों का असर न के बराबर है। जैसे ही ये रेक शहरों और कस्बों के बीच से गुजरती हैं, हवा में फैलने वाला कोयला धूल सबसे पहले स्थानीय आबादी को प्रभावित करता है, बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है।

कोयला ढुलाई में होने वाली यह लापरवाही सिर्फ पर्यावरण या स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी सवाल है। लोडिंग करने वाली एजेंसी, रेलवे की निरीक्षण प्रणाली और पर्यावरण नियामक संस्था, तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे नियमों का पालन सुनिश्चित कराएँ। कोयला देश की ऊर्जा व्यवस्था का आधार है, लेकिन उसके परिवहन में नियमों की इतनी खुली अनदेखी किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कही जा सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह समस्या गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है। इसके लिए जरूरी है कि रेलवे लोडिंग पॉइंट पर प्रोफाइलिंग की मशीनें लगाए, ओवरलोडिंग पर कड़ी कार्रवाई हो, रेक की मॉनिटरिंग प्रणाली मजबूत की जाए और आबादी वाले इलाकों में चलने वाली रेक के लिए विशेष धूल नियंत्रण उपाय सुनिश्चित किए जाएँ।

कोयले की ढुलाई से ऊर्जा उत्पादन तो बढ़ सकता है, लेकिन यदि इसके साथ लोगों के फेफड़े और वातावरण को नुकसान पहुँचे तो यह विकास नहीं, विनाश की ओर बढ़ता कदम कहा जाएगा। नियमों का पालन सख्ती से हो, तभी जनता को राहत और पर्यावरण को संरक्षण मिल सकेगा।

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