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माफी या बर्खास्तगी? मंत्री पर बढ़ा दबाव, राज्यभर में पत्रकारों का प्रदर्शन
Hazaribagh Journalist Attack: झारखंड की राजनीति में इन दिनों एक अजीब विडंबना दिखाई दे रही है जहाँ व्यवस्था की सेहत सुधारने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वहीं से सवालों के प्रति असहिष्णुता की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। ताज़ा घटनाक्रम में मंत्री डॉ. इरफान अंसारी एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। पहले मीडिया पर अनधिकृत का ठप्पा लगाने वाला आदेश, और अब उनकी मौजूदगी में पत्रकारों के साथ कथित मारपीट का मामला।
कुछ समय पहले जारी उस चर्चित आदेश ने पहले ही बहस छेड़ दी थी, जिसमें अस्पतालों में यूट्यूबर और अनधिकृत मीडिया के प्रवेश व वीडियोग्राफी पर रोक की बात कही गई थी। सवाल तब भी उठा था: अनधिकृत कौन तय करेगा? और क्या कैमरा अब पहचान पत्र देखकर ही सच दिखाएगा?
अब हजारीबाग की घटना ने उस बहस को और तेज कर दिया है। आरोप है कि राष्ट्रीय स्तर के मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने जब सवाल पूछे, तो जवाब देने की बजाय माहौल गरमा गया और मंत्री के समर्थकों द्वारा धक्का-मुक्की व मारपीट की गई। यह घटना सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है जहाँ असहज सवालों को संवाद से नहीं, दबाव से मैनेज करने की कोशिश की जाती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी तेज हैं। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि मंत्री जनता और मीडिया के सवालों का सामना नहीं कर सकते, तो उन्हें पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है।
हजारीबाग में सवाल पूछने पर नाराज स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी के इशारे पर उनके एक दर्जन समर्थकों द्वारा News 18 Jharkhand के पत्रकार सुशांत सोनी के साथ मारपीट किए जाने की चिंताजनक सूचना मिली है।
लोकतंत्र में सवाल पूछना पत्रकारों का अधिकार है, लेकिन वंशवाद के सहारे राजनीति करने… pic.twitter.com/hL0Y8uYsPJ
— Babulal Marandi (@yourBabulal) April 28, 2026
इधर, प्रशासन की ओर से जाँच और कार्रवाई की बात कही जा रही है। लेकिन अनुभव बताता है कि ऐसे मामलों में “जाँच जारी है” अक्सर एक लंबी प्रक्रिया का शॉर्टकट वाक्य बनकर रह जाता है।
एक तरफ अनधिकृत मीडिया को अस्पतालों से दूर रखने का आदेश जारी होता है, और दूसरी तरफ वही मीडिया जब सवाल पूछता है तो उसे अनावश्यक मानकर किनारे करने की कोशिश होती है। यानी, न कैमरा दिखे, न सवाल सुने जाएँ। तब शायद व्यवस्था अपने आप स्वस्थ घोषित हो जाएगी।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन अगर उस स्तंभ को ही कमजोर करने की कोशिश हो, तो पूरी संरचना पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सवाल पूछना पत्रकार का कर्तव्य है, और जवाब देना सत्ता की जिम्मेदारी। अगर यह संतुलन बिगड़ता है, तो सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है, क्योंकि सच धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाता है। आज झारखंड के इस घटनाक्रम ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है, क्या व्यवस्था आलोचना से सुधरेगी, या आलोचकों को चुप कराकर? और अगर हर सवाल को हमला मान लिया जाएगा, तो फिर जवाबदेही किसे कहा जाएगा?
राज्यभर में इस घटना के बाद पत्रकारिता जगत में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिल रहा है। स्वतंत्र पत्रकारों से लेकर विभिन्न पत्रकार संगठनों, रांची प्रेस क्लब सहित अलग-अलग जिलों के प्रेस क्लबों ने एकजुट होकर घटना की कड़ी निंदा की है। कई जिलों में पत्रकार काला बिल्ला लगाकर विरोध दर्ज करा रहे हैं और जिला उपायुक्तों को ज्ञापन सौंपकर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। रांची प्रेस क्लब ने मंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है, वहीं कुछ संगठनों ने इससे आगे बढ़ते हुए सरकार से मंत्री को पद से हटाने तक की मांग उठाई है।
इधर, पूरे मामले पर मंत्री की प्रतिक्रिया ने विवाद को और गहरा कर दिया है। आरोप है कि घटना पर सवाल उठने के बावजूद मंत्री इसे विपक्षी एजेंडा करार दे रहे हैं। पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों को पक्षपातपूर्ण बताकर खारिज किया जा रहा है और बातचीत के दौरान फोन काट देने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। इस रवैये ने पत्रकार समुदाय में और नाराजगी बढ़ा दी है, जहां अब यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही से बचने की यह प्रवृत्ति आखिर किस दिशा में ले जाएगी।
हजारीबाग की घटना ने एक बार फिर भाजपा का असली चेहरा बेनकाब कर दिया है।
मैं 28 अप्रैल को हजारीबाग एक पीड़ित अल्पसंख्यक परिवार के आंसू पोंछने गया था। मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना था कि उस परिवार का दर्द सुनूं, उनकी समस्या को समझूं और न्याय दिलाने की दिशा में ठोस पहल करूं। लेकिन भाजपा के… pic.twitter.com/xhipm4cqRi— Dr. Irfan Ansari (@IrfanAnsariMLA) April 29, 2026
फिलहाल, राज्य में चर्चा जारी है, राजनीति गरम है, और जनता इंतज़ार में कि इस बार कार्रवाई सच में होगी, या फिर यह मामला भी खबरों की भीड़ में धीरे-धीरे गुम हो जाएगा।
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