Jharkhand में पेसा कानून (PESA Act) लागू न होने पर रघुवर दास का सरकार पर हमला, विदेशी धर्म के प्रभाव का लगाया आरोप

Raghuvar Das attacks the government for not implementing PESA Act in Jharkhand, accuses of influence of foreign religion

Ranchi, 28 मई 2025 (बुधवार): झारखंड (Jharkhand) में पेसा कानून (PESA Act) के क्रियान्वयन में हो रही देरी को लेकर राज्य की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल रघुवर दास ने सोमवार को एक प्रेसवार्ता में हेमंत सोरेन सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विदेशी धर्म मानने वालों के दबाव में आदिवासी समाज के अधिकारों को नजरअंदाज कर रही है और पेसा कानून लागू करने से पीछे हट रही है।




पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड जैसे पाँचवीं अनुसूची वाले राज्य में जहां जनजातीय समुदाय की संख्या उल्लेखनीय है, वहां पेसा कानून के तहत पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को अब तक लागू नहीं करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने पूछा, “एक सरना धर्म के मुख्यमंत्री होने के बावजूद क्या पेसा कानून लागू करने से हेमंत सरकार को खतरा है?”

दास ने कहा कि 1996 में संसद द्वारा पारित इस कानून को अन्य राज्यों ने लागू कर दिया है, जबकि झारखंड में जुलाई 2023 में पेसा नियमावली का प्रारूप प्रकाशित किए जाने के बावजूद अब तक कैबिनेट से पारित नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि विधि विभाग और महाधिवक्ता की ओर से भी नियमावली पर सहमति मिल चुकी है। इसके बावजूद सरकार अब तक इसे लागू नहीं कर रही, जिससे संदेह उत्पन्न होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार में उच्च पदों पर बैठे कुछ लोग, जो आदिवासी परंपरा से इतर विदेशी धर्म मानते हैं, पेसा कानून के विरोध में हैं। दास ने कहा कि इन लोगों का उद्देश्य पारंपरिक आदिवासी शासन व्यवस्था को कमजोर करना है और आधुनिक निर्वाचित प्रणाली के ज़रिए अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना है।




पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि पेसा कानून लागू होने से राज्य के 112 अनुसूचित प्रखंडों में ग्राम सभा को भूमि, जल, जंगल, खनिज सहित विकास योजनाओं पर निर्णय लेने का अधिकार मिल जाएगा। इससे बालू-पत्थर माफिया और ठेकेदारी सिंडिकेट की पकड़ कमजोर होगी, जो संभवतः सरकार पर दबाव बना रहे हैं।

प्रेसवार्ता में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) आदिवासी संस्कृति के प्रति गंभीर नहीं हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 1961 की जनगणना से आदिवासी कोड कांग्रेस के शासन में हटाया गया था, और 2012 में मनमोहन सिंह सरकार ने लोकसभा में सरना कोड को खारिज कर दिया था।

प्रवक्ता शिवपूजन पाठक, रमाकांत महतो और अशोक बड़ाइक की उपस्थिति में हुई इस प्रेसवार्ता में दास ने यह भी मांग की कि जाति प्रमाण पत्र फॉर्म में ‘धर्म’ का कॉलम पुनः जोड़ा जाए, ताकि आदिवासी समाज की नौकरी और आरक्षण से संबंधित पहचान सुरक्षित रह सके।

  • क्या है पेसा कानून?

पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996—जिसे पेसा कानून कहा जाता है—पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्राम सभा को अधिकृत बनाता है। इसका उद्देश्य आदिवासी समुदाय की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को कानूनी संरक्षण देना है। कानून के तहत ग्राम सभाओं को स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों, भूमि हस्तांतरण, सामाजिक न्याय और विकास कार्यों पर निर्णय लेने का अधिकार होता है। पेसा नियमावली को अंतिम रूप देना राज्य सरकार का दायित्व है, जो अब तक लंबित है। राज्य सरकार की ओर से इस विषय पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन आदिवासी समाज और सिविल सोसाइटी से जुड़े संगठनों की निगाहें इस मुद्दे पर टिकी हैं।




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Author: WM 24x7 News

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