Teacher’s Day Special: क्या शिक्षक दिवस अब आदर का दिन नहीं, बल्कि जबरन चंदा वसूली का पर्व बन गया है? यह सवाल हर उस अभिभावक के मन में उठता है, जो अपने बच्चों की मासूम मांगों के पीछे छिपे बोझ को देखता है।
भारत के महान दार्शनिक और राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन चाहते थे कि उनका जन्मदिन गुरु के सम्मान और शिक्षा की गरिमा को समर्पित हो। उनका मानना था कि शिक्षक समाज की रीढ़ हैं और उनका असली सम्मान ज्ञान और संस्कार में है, न कि दिखावे और उपहारों में।
लेकिन आज स्थिति उलट गई है। कई विद्यालयों में शिक्षक दिवस चंदा वसूली और दिखावे का जरिया बन चुका है। छात्रों से पैसे इकट्ठे कराए जाते हैं, महंगे तोहफे खरीदे जाते हैं, फोटोशूट और भव्य कार्यक्रम आयोजित होते हैं। नतीजा, आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावक अतिरिक्त बोझ तले दब जाते हैं। बच्चे घर लौटकर माता-पिता से ज़बरन पैसे मांगते हैं, और यह दिन आदर से ज्यादा तनाव का कारण बन जाता है।
विडंबना यह है कि शिक्षक और स्कूल प्रबंधन इस पर रोक लगाने के बजाय चुप्पी साधे रहते हैं। आखिर क्यों न करें? प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ उन्हें ही तो मिलता है। लेकिन क्या गुरु की गरिमा का मतलब यही रह गया है कि बच्चों और अभिभावकों से धन उगाही कर सम्मान खरीदा जाए?
सच्चाई यह है कि महंगे उपहार से सम्मान नहीं मिलता। शिक्षक के लिए बच्चों का प्यार, उनकी सच्ची श्रद्धा और एक धन्यवाद पत्र ही सबसे बड़ा उपहार है। आज ज़रूरत है कि शिक्षक और प्रबंधन खुद आगे आकर कहें,
“न तोहफ़ा चाहिए, न चंदा। हमें चाहिए सिर्फ़ बच्चों का आदर, प्यार और सच्चा सम्मान।”
अगर यह चंदा संस्कृति नहीं रुकी, तो आने वाली पीढ़ियाँ शिक्षक दिवस को श्रद्धा का नहीं, शोषण और दिखावे का दिन मानेंगी। समय आ गया है कि समाज और शिक्षा जगत आत्ममंथन करे और इस पर्व को उसकी सादगी व गरिमा के साथ मनाए। यही होगी डॉ. राधाकृष्णन को सच्ची श्रद्धांजलि।
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