Sahibganj: देश की सर्वोच्च संवैधानिक ऑडिट संस्था नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी प्रदर्शन अंकेक्षण रिपोर्ट में साहिबगंज जिले की खनन लीज प्रक्रिया से जुड़े कई गंभीर मामलों को रिकॉर्ड पर दर्ज किया। रिपोर्ट में नियमों के उल्लंघन, आवेदन प्रक्रिया में अनियमितताओं, ई-ऑक्शन की अनदेखी, आवेदन क्षेत्र में बदलाव, दस्तावेजी कमियों और सक्षम प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र से जुड़े प्रश्न उठाए गए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है, इतने गंभीर ऑडिट निष्कर्षों के बावजूद आखिर अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कैग कोई सामान्य जांच एजेंसी नहीं है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 से 151 के तहत स्थापित देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था है, जिसकी रिपोर्टें संसद और विधानमंडलों के समक्ष प्रस्तुत की जाती हैं। जब ऐसी संस्था किसी सरकारी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत करती है, तो सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में अपेक्षा की जाती है कि संबंधित विभाग तथ्यों की जांच कर जिम्मेदारी तय करे। लेकिन साहिबगंज से जुड़े मामलों में ऐसी कोई सार्वजनिक कार्रवाई अब तक सामने नहीं आई है।
कैग ने अपने ऑडिट में ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें तीन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र के लिए प्राप्त आवेदन को घटाकर तीन हेक्टेयर से कम कर दिया गया और उसके बाद लीज प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। ऑडिट ने यह भी दर्ज किया कि आवेदन क्षेत्र में परिवर्तन के संबंध में आवेदक की ओर से कोई अनुरोध उपलब्ध नहीं था। रिपोर्ट में इस कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा गया कि इससे ई-ऑक्शन की अनिवार्य प्रक्रिया से बचने की स्थिति उत्पन्न हुई और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
रिपोर्ट में एक अन्य मामले में यह भी उल्लेख है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर आवश्यक स्वीकृतियां प्रस्तुत नहीं करने के कारण “डीम्ड रिजेक्टेड” माने जा चुके आवेदन को बाद में पुनः प्रक्रिया में लाकर 4.74 हेक्टेयर की माइनिंग लीज प्रदान कर दी गई। ऑडिट ने इस मामले में तत्कालीन जिला खनन पदाधिकारी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव और उपायुक्त स्तर पर लिए गए निर्णय पर गंभीर प्रश्न उठाए।
इतना ही नहीं, कैग ने 6.026 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली एक खनन लीज के नवीकरण पर भी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि संशोधित नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में ई-ऑक्शन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। ऑडिट के अनुसार यदि नियमों का पालन किया जाता, तो राज्य सरकार को अधिक राजस्व प्राप्त हो सकता था।
रिपोर्ट में साहिबगंज जिले के कई लीज आवेदनों में अधूरे शपथपत्र, रॉयल्टी क्लीयरेंस प्रमाणपत्रों की कमी और आवेदन पत्रों की अपूर्ण जांच का भी उल्लेख किया गया है। इन टिप्पणियों ने जिला खनन कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
इसके बावजूद आज तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि क्या इन मामलों की विभागीय जांच शुरू हुई, क्या किसी अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा गया, क्या किसी फाइल की दोबारा समीक्षा की गई या क्या किसी लीज की वैधता का पुनर्मूल्यांकन हुआ। यदि ऐसी कोई कार्रवाई हुई है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है।
यही स्थिति अब कई नए प्रश्न पैदा करती है। क्या कैग की रिपोर्ट केवल सरकारी अभिलेख बनकर रह जाएगी? क्या जिन मामलों में ऑडिट ने जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता बताई, उनमें किसी अधिकारी की जवाबदेही निर्धारित की जाएगी? क्या उन निर्णयों की समीक्षा होगी, जिनके कारण राज्य को संभावित राजस्व हानि होने की बात रिपोर्ट में कही गई है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या उन तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी जिनके कार्यकाल में ये निर्णय लिए गए?
प्राकृतिक संसाधन किसी व्यक्ति या विभाग की संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की साझा परिसंपत्ति हैं। इसलिए उनके आवंटन में पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन लोकतांत्रिक शासन की मूल अपेक्षा है। यदि देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था किसी प्रक्रिया में गंभीर खामियों की ओर संकेत करती है, तो उन निष्कर्षों पर समयबद्ध कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है।
अब निगाहें राज्य सरकार, खान एवं भूतत्व विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों पर हैं। जनता यह जानना चाहती है कि कैग द्वारा उठाए गए प्रश्नों का उत्तर जांच से दिया जाएगा या फिर यह रिपोर्ट भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगी। साहिबगंज की खनन व्यवस्था पर उठे सवालों का जवाब केवल दस्तावेजों से नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने वाली कार्रवाई से मिलेगा।







