Sahibganj: साहिबगंज वन विभाग एक बार फिर अपने कारनामों को लेकर चर्चा में है। इस बार विभाग ने शहर में पहली बार दिखे एक चीतल का रेस्क्यू तो कर लिया, लेकिन उसे जिंदा नहीं बचा पाया। नतीजा यह हुआ कि लोग अब यह कहने लगे हैं कि साहिबगंज वन विभाग के संरक्षण में पहुंचना, वन्यजीवों के लिए भी रिस्की साबित हो सकता है।
शनिवार सुबह शहर के नॉर्थ कॉलोनी स्थित बिजली कार्यालय के पास एक जंगली चीतल दिखाई दिया। चीतल को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट गई। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम भी पहुंची और काफी मशक्कत के बाद चीतल को पकड़ लिया गया। यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन असली कहानी उसके बाद शुरू हुई। विभाग चीतल को इलाज के लिए पशु चिकित्सक के पास ले गया, जहां कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई।

अब शहर में सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है कि जो चीतल थोड़ी देर पहले तक उछल-कूद कर रहा था, वह इलाज के नाम पर आखिर ऐसा क्या देख बैठा कि उसकी जान ही चली गई। लोग तंज कस रहे हैं कि चीतल जंगल से भटककर शहर में क्या आया, सीधे वन विभाग के सिस्टम में फंस गया।
वन विभाग ने बयान जारी कर कहा है कि मौत के कारणों की जांच की जा रही है। मगर जनता पूछ रही है कि जांच कौन करेगा? वही विभाग जो खुद सवालों में घिरा है? लोग यह भी जानना चाहते हैं कि आखिर जिस पशु चिकित्सक से इलाज कराया गया, क्या उन्हें वन्यजीवों के इलाज का अनुभव भी था या फिर जो मिला, उसी के भरोसे इलाज शुरू कर दिया गया।
वैसे साहिबगंज वन विभाग का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं रहा है। साल 2019 के आखरी दिन पतना प्रखंड के तालबड़िया गांव में निकले तेंदुए ने पूरे इलाके में दहशत मचा दी थी। दर्जनों लोग घायल हुए, लेकिन वन विभाग तेंदुए को पकड़ने में ऐसा उलझा कि लोग तमाशा देखने लगे। हालत यह थी कि विभाग के पास न पर्याप्त उपकरण थे और न अनुभव। आखिरकार तेंदुआ तो अपनी चालाकी दिखाकर निकल गया, लेकिन विभाग की किरकिरी पूरे जिले में हुई। आसपास के लोगों ने नए साल का जश्न तेंदुए के डर में मनाया।

अब हाथी का मामला भी कम दिलचस्प नहीं है। वर्ष 2017 में झुंड से बिछड़े एक हाथी ने तीन महीने में 11 लोगों की जान ले ली थी। हाथी को पकड़ने के लिए साहिबगंज वन विभाग ने ऐसा अभियान चलाया, मानो कोई फिल्म की शूटिंग हो रही हो। हैदराबाद से मशहूर हंटर नवाब शहफत अली खान को बुलाया गया। पश्चिम बंगाल की एक्सपर्ट टीम, उत्तर प्रदेश के महावत, पटना जू के विशेषज्ञ, होमगार्ड जवान, वनरक्षी और लोकल ट्रेनर पूरा कारवां जंगल में उतार दिया गया।भतभंगा पहाड़ पर हाथी दिखा तो उसे बेहोश करने के लिए गोली दागी गई। मगर हाथी शायद विभाग की तैयारी समझ चुका था। पहली गोली का डोज कम पड़ा, हाथी आराम से पहाड़ चढ़ता रहा। फिर दूसरी गोली चली, लेकिन हाथी तब भी नहीं सोया। उल्टा जंगल से निकलकर बांझी के बालको गांव तक पहुंच गया और पूरा विभाग उसके पीछे दौड़ता रह गया। शाम तक बारिश शुरू हो गई और अभियान बंद करना पड़ा। उस समय भी इलाके में लोग मजाक में कहने लगे थे, हाथी नहीं पकड़ा गया, लेकिन वन विभाग जरूर थककर बेहोश हो गया।
फिर कुछ महीने पहले पतना में एक मदारी भालू लेकर खेल दिखाने पहुंचा। वन विभाग की टीम पहुंची तो मदारी भालू का बेल्ट खोलकर फरार हो गया और विभाग भालू पकड़ने में व्यस्त रह गया। उस समय इलाके में लोगों ने चुटकी ली थी: भालू पकड़ा गया, लेकिन असली खिलाड़ी मदारी फरार।

अब चीतल की मौत के बाद लोगों का कहना है कि साहिबगंज वन विभाग की कहानियां कभी कॉमेडी बन जाती हैं तो कभी ट्रेजेडी। फर्क सिर्फ इतना है कि हर बार फजीहत विभाग की होती है और नुकसान बेचारे वन्यजीवों का।
फिलहाल शहर में चर्चा यही है कि अगर कोई वन्यजीव गलती से साहिबगंज जिले में घुस जाए, तो उसे इंसानों से कम और सिस्टम से ज्यादा डरना चाहिए।
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