Sahibganj में कम दर पर रॉयल्टी वसूली का बड़ा खेल उजागर! सरकार को करोड़ों के राजस्व नुकसान का खुलासा

Major racket involving collection of royalties at reduced rates exposed in Sahibganj; revelation of revenue loss worth crores to the government.

Sahibganj: झारखंड में खनिज राजस्व संग्रहण व्यवस्था पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने एक और गंभीर खामी उजागर की है। इस बार सवाल खनन पट्टों के आवंटन पर नहीं, बल्कि सरकार के राजस्व की वसूली पर उठे हैं। ऑडिट के अनुसार साहिबगंज सहित तीन जिलों में पत्थर की रॉयल्टी कम दर पर वसूली गई, जिससे राज्य सरकार और जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMFT) को कुल ₹5.35 करोड़ का संभावित राजस्व नुकसान हुआ।

CAG की प्रदर्शन अंकेक्षण रिपोर्ट के अनुसार झारखंड माइनर मिनरल कंसेशन (JMMC) नियम, 2004 की अनुसूची-2 में पत्थर के उपयोग के आधार पर अलग-अलग रॉयल्टी दरें निर्धारित हैं। सामान्य पत्थर के बोल्डर, बजरी और शिंगल पर ₹132 प्रति घन मीटर अर्थात लगभग ₹3.74 प्रति घन फुट की दर से रॉयल्टी निर्धारित थी। वहीं यदि वही पत्थर स्टोन चिप्स बनाने के लिए उपयोग किया जाता है तो उस पर ₹250 प्रति घन मीटर अर्थात लगभग ₹7.08 प्रति घन फुट की दर से रॉयल्टी वसूल की जानी थी।

ऑडिट में पाया गया कि खनिज प्रबंधन प्रणाली (JIMMS) में यह सुनिश्चित करने की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं थी कि खदान से निकाले गए पत्थर का वास्तविक अंतिम उपयोग क्या हुआ। परिणामस्वरूप रॉयल्टी का निर्धारण पूरी तरह पट्टाधारकों द्वारा घोषित अंतिम उपयोग पर निर्भर रहा। कैग ने इस व्यवस्था को गंभीर प्रशासनिक कमजोरी बताया है।

रिपोर्ट के अनुसार साहिबगंज, चतरा और पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) के जिला खनन कार्यालयों के अधिकार क्षेत्र में कार्यरत 25 पट्टाधारकों ने अक्टूबर 2019 से जनवरी 2022 के बीच लगभग 122.96 लाख घन फुट पत्थर के बोल्डर 15 स्टोन क्रशर इकाइयों को आपूर्ति किए। चूंकि स्टोन क्रशर का मुख्य उद्देश्य पत्थर को चिप्स में परिवर्तित करना होता है, इसलिए इस खनिज पर ₹7.08 प्रति घन फुट की दर से रॉयल्टी लागू होनी चाहिए थी।

लेकिन ऑडिट में पाया गया कि इन आपूर्तियों पर केवल ₹3.74 प्रति घन फुट की दर से रॉयल्टी वसूली गई। अर्थात उच्च दर लागू किए जाने के बजाय कम दर पर राजस्व लिया गया। कैग के अनुसार इसी वजह से रॉयल्टी और जिला खनिज प्रतिष्ठान (DMFT) अंशदान मिलाकर ₹5.35 करोड़ की कम वसूली हुई।

रिपोर्ट ने खनिज प्रबंधन प्रणाली की संरचना पर भी सवाल उठाया है। ऑडिट के अनुसार JIMMS में 5 मिलीमीटर तक के छोटे पत्थरों को भी बोल्डर की श्रेणी में माना गया, जिसे कैग ने अव्यावहारिक बताया। इससे वास्तविक उपयोग और वास्तविक उत्पाद के आधार पर सही रॉयल्टी निर्धारण की व्यवस्था और कमजोर हो गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खनिज का अंतिम उपयोग सत्यापित करने की कोई प्रभावी प्रणाली नहीं होगी, तो कम रॉयल्टी घोषित कर राजस्व की हानि की संभावना लगातार बनी रहेगी। ऐसे में केवल पट्टाधारकों के स्व-घोषणा पत्र पर निर्भर रहना सरकारी राजस्व हितों के लिए जोखिमपूर्ण व्यवस्था साबित हो सकता है।

साहिबगंज, जो राज्य का सबसे बड़ा स्टोन माइनिंग क्लस्टर माना जाता है, वहां इस प्रकार की ऑडिट टिप्पणी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जिले से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में स्टोन चिप्स देश के विभिन्न राज्यों तक भेजे जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि स्टोन क्रशरों को भेजे गए पत्थरों पर भी कम दर से रॉयल्टी वसूली गई, तो वास्तविक राजस्व हानि का दायरा कितना व्यापक हो सकता है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि CAG द्वारा कम रॉयल्टी वसूली का मामला उजागर किए जाने के बाद क्या संबंधित जिला खनन कार्यालयों की भूमिका की जांच होगी? क्या कम वसूली गई रॉयल्टी की पुनः गणना कर बकाया राशि वसूल की जाएगी? और क्या खनिज प्रबंधन प्रणाली में ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित की जाएगी, जिससे खनिज के वास्तविक अंतिम उपयोग के आधार पर ही रॉयल्टी निर्धारित हो सके?

देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था की यह टिप्पणी केवल राजस्व संग्रहण की तकनीकी कमी नहीं दर्शाती, बल्कि यह संकेत भी देती है कि यदि निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो राज्य को भविष्य में भी करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

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Author: WASIM AKRAM

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