सिस्टम ने नहीं सीखा सबक? DMFT Sahibganj में अनियमितताओं की पुनरावृत्ति

Has the system not learned its lesson? Recurrence of irregularities in DMFT Sahibganj.
  • राजस्व रिसाव से लेकर बकाया वसूली तक, दो वित्तीय वर्षों में भी हालात जस के तस

Sahibganj: जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट साहिबगंज (DMFT Sahibganj) के वित्तीय वर्ष 2021-22 और 2022-23 की ऑडिट रिपोर्ट का तुलनात्मक अध्ययन से एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आयी है। 2021-22 की ऑडिट में जिन अनियमितताओं, कमियों और प्रशासनिक चूकों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था, वे न केवल 2022-23 में भी जस की तस बनी रहीं, बल्कि कई मामलों में और गंभीर रूप लेती चली गईं। यह स्थिति साफ तौर पर तत्कालीन जिला प्रशासन की लापरवाही, अनदेखी और जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति को उजागर करती है।

सबसे बड़ी और लगातार दोहराई गई आपत्ति रेवेन्यू लीकेज को लेकर है। 2021-22 की ऑडिट रिपोर्ट में यह साफ कहा गया था कि रॉयल्टी के आधार पर डीएमएफटी को मिलने वाली राशि की सही गणना के लिए जिला स्तर पर कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है। इसके बावजूद 2022-23 की ऑडिट रिपोर्ट में भी वही स्थिति पाई गई। लीज-वार रॉयल्टी, डीएमएफटी देयता और वास्तविक वसूली के आंकड़ों का मिलान अब भी नहीं किया गया, जिससे यह तय ही नहीं हो सका कि जिले को वास्तविक रूप से कितना डीएमएफटी फंड मिलना चाहिए था। ऑडिट की भाषा में यह सीधे-सीधे संभावित करोड़ों रुपये के नुकसान की ओर इशारा करता है।

बैंक प्रबंधन में लापरवाही का मामला भी दोनों वर्षों में एक जैसा रहा। 2021-22 में ऑडिटर ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि डीएमएफटी की भारी राशि करंट अकाउंट में रखी जा रही है, जिससे ब्याज का नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद 2022-23 में भी राशि को सेविंग अकाउंट में स्थानांतरित नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, एक और वित्तीय वर्ष में सार्वजनिक धन पर मिलने वाला ब्याज प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ गया। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट सुझाव दिए जा चुके थे, तो उन्हें लागू क्यों नहीं किया गया।

फिक्स्ड एसेट रजिस्टर का अभाव भी लगातार बना रहा। ऑडिटर ने कहा था कि डीएमएफटी मद से निर्मित परिसंपत्तियों का कोई स्थायी रजिस्टर नहीं रखा जा रहा है और न ही मूल्यह्रास का प्रावधान किया गया है। 2022-23 की रिपोर्ट में भी वही आपत्ति दोहराई गई। यानी करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियों का न तो समुचित लेखा-जोखा रखा गया और न ही उनकी वास्तविक स्थिति का आकलन किया गया। यह स्थिति न सिर्फ लेखा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि भविष्य में बड़े घोटाले की जमीन भी तैयार करती है।

दोनों ऑडिट रिपोर्ट में एक और गंभीर समानता पीआरइजेएचए को दिए गए 3.50 करोड़ रुपये के ऋण को लेकर दिखती है। 2021-22 में यह ऋण बकाया बताया गया था और 2022-23 में भी उसकी वसूली नहीं हो सकी। खनन प्रभावितों के कल्याण के लिए बने फंड से ऋण देना और फिर वर्षों तक उसे वापस न लेना, प्रशासनिक गंभीरता पर सीधा सवाल खड़ा करता है। हालाँकि सूत्रों से ऐसी जानकारियां सामने आयीं कि डीएमएफटी पर लगातार खबर प्रकाशन के बाद हरकत में आयी जिला प्रशासन ने पीआरइजेएचए को राशि की वापसी को लेकर नोटिस जारी किया है।

लेखा प्रणाली की कमजोरी भी दोनों वर्षों में जस की तस बनी रही। 2021-22 में ऑडिटर ने डबल एंट्री सिस्टम लागू करने और आधुनिक अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर अपनाने की सिफारिश की थी, लेकिन 2022-23 में भी खाते उसी पुरानी और अपारदर्शी प्रणाली में संधारित पाए गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि सुधार के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई गईं।

इन तथ्यों का तुलनात्मक विश्लेषण यह साबित करता है कि 2021-22 की ऑडिट रिपोर्ट केवल एक चेतावनी बनकर रह गई, जिस पर न तो तत्कालीन जिला प्रशासन ने ठोस कार्रवाई की और न ही डीएमएफटी समिति ने सुधारात्मक कदम उठाए। यदि 2021-22 की आपत्तियों पर समय रहते कार्रवाई होती, तो 2022-23 में वही गड़बड़ियां दोबारा सामने नहीं आतीं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक ही तरह की अनियमितताएं लगातार दो वर्षों तक ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज होती रहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर जानबूझकर की गई अनदेखी? खनन प्रभावित समुदायों के लिए बना डीएमएफटी फंड अगर इसी तरह नियमों और चेतावनियों को नजरअंदाज करता रहा, तो इसका सीधा नुकसान उन्हीं लोगों को होगा, जिनके नाम पर यह फंड बनाया गया था।

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WASIM AKRAM
Author: WASIM AKRAM

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