Ranchi: झारखंड प्रदेश Congress कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता विजय शंकर नायक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आय, संपत्तियों, फंडिंग स्रोतों और कानूनी स्थिति को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए कहा है कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकती। उन्होंने झारखंड सरकार से भी कर्नाटक की तर्ज पर राज्य में संचालित आरएसएस एवं उससे संबद्ध संस्थाओं की वित्तीय और प्रशासनिक जानकारी सार्वजनिक करने की पहल करने का आग्रह किया है।
रविवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में विजय शंकर नायक ने कहा कि कर्नाटक सरकार द्वारा आरएसएस की कानूनी स्थिति, आय के स्रोतों, संपत्तियों और गतिविधियों से संबंधित जानकारी मांगे जाने के बाद देशभर में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हुई है। उन्होंने कहा कि जब राजनीतिक दलों, ट्रस्टों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को अपनी वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करनी होती है, तो आरएसएस को भी अपनी आय, व्यय, संपत्तियों और फंडिंग के स्रोतों का खुलासा करना चाहिए।
कांग्रेस प्रवक्ता ने इस मुद्दे पर कर्नाटक के भाजपा सांसद रमेश जिगाजिनगी के कथित बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि किसी संगठन से उसकी कानूनी स्थिति और वित्तीय स्रोतों के बारे में जानकारी मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत एक वैध और संवैधानिक प्रक्रिया है।
विजय शंकर नायक ने कहा कि भारतीय संविधान समानता, सामाजिक न्याय और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित है तथा देश के करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, महिलाओं और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आरएसएस को अपनी कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए यह बताना चाहिए कि उसके पास आने वाली धनराशि किन स्रोतों से प्राप्त होती है और उसका उपयोग किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
उन्होंने झारखंड सरकार से मांग की कि राज्य में संचालित आरएसएस और उससे संबद्ध संस्थाओं की गतिविधियों, वित्तीय स्रोतों, चल-अचल संपत्तियों तथा सरकारी सुविधाओं के उपयोग से संबंधित उपलब्ध सूचनाओं का संकलन कर उन्हें सार्वजनिक किया जाए, ताकि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की भावना को और मजबूत किया जा सके।
अपने बयान के अंत में कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं बल्कि नागरिक अधिकार है। जो संगठन दूसरों से जवाबदेही की अपेक्षा करता है, उसे स्वयं भी जनता के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने संविधान को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि संविधान से ऊपर कोई व्यक्ति, संगठन या विचारधारा नहीं हो सकती।
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