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Sahibganj में 4.74 हेक्टेयर लीज मंजूरी पर CAG का बड़ा खुलासा
Sahibganj: झारखंड के साहिबगंज जिले में पत्थर खनन लीज आवंटन को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट (2025) ने एक ऐसा मामला उजागर किया है, जो न केवल खनन नियमों के उल्लंघन की ओर इशारा करता है बल्कि जिला प्रशासन और खनन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। रिपोर्ट के अनुसार एक ऐसा आवेदन, जिसे नियमों के तहत स्वतः खारिज माना जा चुका था, उसे बाद में पुनर्जीवित कर 4.74 हेक्टेयर रैयती भूमि पर खनन लीज प्रदान कर दी गई।
मामले की शुरुआत सितंबर 2017 में हुई थी, जब एक आवेदक ने 4.74 हेक्टेयर रैयती भूमि पर स्टोन माइनिंग लीज के लिए आवेदन किया। जिला खनन पदाधिकारी (DMO), साहिबगंज ने अक्टूबर 2017 में उसे लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी कर दिया। इसके बाद 12 दिसंबर 2017 को झारखंड माइनर मिनरल कंसेशन (JMMC) नियमावली में संशोधन किया गया, जिसके अनुसार LoI जारी होने की तिथि से 180 दिनों के भीतर आवेदक को माइनिंग प्लान (MP) एवं पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) जमा करना अनिवार्य था।
रिपोर्ट के अनुसार आवेदक 11 जून 2018 तक आवश्यक दस्तावेज जमा नहीं कर सका। परिणामस्वरूप नियमों के तहत उसका आवेदन जून 2018 में स्वतः “डीम्ड रिजेक्टेड” माना गया। सामान्य परिस्थितियों में यहीं पर आवेदन की प्रक्रिया समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन ऑडिट में सामने आया कि आवेदन खारिज माने जाने के लगभग 16 महीने बाद आवेदक ने अक्टूबर 2019 में राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) के समक्ष पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए आवेदन किया, जिसे नवंबर 2019 में मंजूरी भी मिल गई।

इसके बाद मामला एक नया मोड़ लेता है। सितंबर 2020 में JMMC नियमावली में फिर संशोधन किया गया, जिसमें यह प्रावधान जोड़ा गया कि यदि 180 दिनों के भीतर आवश्यक स्वीकृतियां जमा नहीं हो सकीं और देरी के लिए आवेदक जिम्मेदार नहीं था, तो माइंस कमिश्नर मामले के गुण-दोष के आधार पर विचार कर सकते हैं।
इसी संशोधन के बाद आवेदक ने अक्टूबर 2020 में माइंस कमिश्नर के समक्ष रिवीजन याचिका दायर की। माइंस कमिश्नर ने दिसंबर 2020 में मामले को पुनर्विचार के लिए उपायुक्त, साहिबगंज के पास भेजते हुए निर्देश दिया कि नियमों के अनुरूप आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त होने की स्थिति में मामले पर नए सिरे से विचार किया जाए।
लेकिन यहीं से पूरा मामला विवादों में घिर गया। कैग रिपोर्ट के अनुसार जिला खनन पदाधिकारी, साहिबगंज ने माइंस कमिश्नर के आदेश की ऐसी व्याख्या की, मानो कमिश्नर ने स्वयं यह मान लिया हो कि पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करने में हुई देरी के लिए आवेदक जिम्मेदार नहीं था। इसी आधार पर DMO ने उपायुक्त को प्रस्ताव भेज दिया।
ऑडिट ने इस निष्कर्ष को भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। रिपोर्ट के अनुसार देरी के लिए स्वयं आवेदक जिम्मेदार था, क्योंकि उसने जून 2018 में आवेदन डीम्ड रिजेक्ट हो जाने के बावजूद अक्टूबर 2019 तक पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए आवेदन ही नहीं किया था। अर्थात लगभग दस महीने बाद जाकर उसने EC के लिए पहल की। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता था कि देरी आवेदक के नियंत्रण से बाहर थी।
इसके बावजूद जिला खनन पदाधिकारी द्वारा भेजे गए प्रस्ताव के आधार पर उपायुक्त ने फरवरी 2021 में माइनिंग लीज स्वीकृत कर दी। इसके बाद अप्रैल 2021 में 08 अप्रैल 2021 से 07 अप्रैल 2031 तक के लिए दस वर्षीय खनन पट्टा निष्पादित कर दिया गया।
कैग रिपोर्ट का सबसे गंभीर निष्कर्ष यह है कि फरवरी 2021 में जब यह स्वीकृति दी गई, तब लागू नियमों के अनुसार तीन हेक्टेयर या उससे अधिक क्षेत्रफल की खनन लीज जिला उपायुक्त के अधिकार क्षेत्र में नहीं थी। JMMC नियमों के तहत तीन हेक्टेयर या उससे अधिक क्षेत्र की खदानों का आवंटन ई-ऑक्शन के माध्यम से किया जाना अनिवार्य था। इसके बावजूद 4.74 हेक्टेयर क्षेत्रफल की रैयती भूमि पर स्थित खदान की लीज सीधे स्वीकृत कर दी गई।
ऑडिट ने स्पष्ट टिप्पणी की है कि यदि नियमों के अनुरूप ई-नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जाती, तो राज्य सरकार को अधिक राजस्व प्राप्त हो सकता था। रिपोर्ट ने जिला खनन पदाधिकारी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को भ्रामक बताते हुए तथा उपायुक्त द्वारा बिना पर्याप्त सत्यापन के लीज स्वीकृत करने पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है।
यह मामला केवल एक खदान की लीज तक सीमित नहीं है। यह उस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है, जिसके तहत एक ऐसा आवेदन, जो नियमों के अनुसार समाप्त माना जा चुका था, बाद में पुनर्जीवित हुआ, पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त हुई, प्रस्ताव तैयार हुआ और अंततः जिला स्तर पर ही एक ऐसी लीज स्वीकृत कर दी गई, जिसके लिए ई-ऑक्शन आवश्यक था।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था द्वारा इतने गंभीर निष्कर्ष दर्ज किए जाने के बाद क्या राज्य सरकार इस मामले की स्वतंत्र जांच कराएगी? क्या उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा होगी? और क्या इस लीज की वैधता की पुनः जांच की जाएगी? साहिबगंज में खनन व्यवस्था को लेकर उठे इन सवालों का जवाब अब प्रशासन को देना होगा।
(Note: मुख्य तस्वीर वास्तविक नहीं है, AI जनरेटेड है।)
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