Sahibganj: क्या साहिबगंज में खनन लीज के लिए अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग नियम लागू किए गए? क्या जिला खनन कार्यालय और तत्कालीन जिला प्रशासन ने नियमों का समान रूप से पालन किया, या फिर मामलों के अनुसार उनकी अलग-अलग व्याख्या की? नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में दर्ज दो मामले ऐसे कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं, जिनका जवाब आज तक प्रशासन की ओर से सार्वजनिक नहीं किया गया है।
देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था की रिपोर्ट के अनुसार एक मामले में 6.026 हेक्टेयर रैयती भूमि पर स्थित स्टोन माइनिंग लीज का अक्टूबर 2017 में दस वर्षों के लिए नवीनीकरण कर दिया गया। जबकि उस समय लागू झारखंड माइनर मिनरल कंसेशन (संशोधन) नियम, 2017 के अनुसार पाँच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र की खनन लीज का निपटान ई-ऑक्शन के माध्यम से होना था और उपायुक्त ऐसे मामले में सक्षम प्राधिकारी नहीं थे। इसके बावजूद नवीनीकरण कर दिया गया। कैग ने स्पष्ट कहा कि इस निर्णय से राज्य सरकार ई-ऑक्शन के माध्यम से अधिक राजस्व प्राप्त करने के अवसर से वंचित हो गई और नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

दूसरी ओर, इसी साहिबगंज में 2.023 हेक्टेयर रैयती भूमि की एक खनन लीज का मामला सामने आया। इस लीज का नवीनीकरण 1 दिसंबर 2017 को तत्कालीन उपायुक्त द्वारा अगले दस वर्षों के लिए स्वीकृत किया गया था। उस समय तक संशोधित नियम लागू भी नहीं हुए थे। लेकिन बाद में 12 दिसंबर 2017 में लागू नियमों का हवाला देते हुए अगस्त 2018 में उस नवीनीकरण को रद्द कर दिया गया और केवल 31 मार्च 2020 तक अस्थायी विस्तार दिया गया।
कैग ने इस कार्रवाई को भी नियमों के अनुरूप नहीं माना। रिपोर्ट के अनुसार जिस प्रावधान के आधार पर नवीनीकरण रद्द किया गया, वह पाँच हेक्टेयर या उससे अधिक क्षेत्र वाली लंबित लीजों पर लागू था, जबकि संबंधित लीज मात्र 2.023 हेक्टेयर की थी। ऑडिट ने यह भी कहा कि नवीनीकरण आदेश संशोधित नियमों के लागू होने से पहले पारित हो चुका था, इसलिए बाद में उसे रद्द करना उचित नहीं था। इस निर्णय से पट्टाधारक दस वर्षों की वैध अवधि से वंचित हुआ और सरकार को भी शेष अवधि का संभावित राजस्व नहीं मिला।

एक ही जिले में सामने आए ये दोनों मामले प्रशासनिक निर्णयों की निरंतरता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। एक मामले में, जहां ऑडिट के अनुसार ई-ऑक्शन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, वहां नवीनीकरण कर दिया गया। दूसरे मामले में, जहां ऑडिट के अनुसार नवीनीकरण वैध था, वहां उसे बाद में रद्द कर दिया गया। यह विरोधाभास बताता है कि नियमों की व्याख्या अलग-अलग मामलों में अलग-अलग ढंग से की गई।
कैग की टिप्पणियों से यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि एक मामले में नियमों की अनदेखी कर लाभ दिया गया और दूसरे मामले में लागू न होने वाले प्रावधानों के आधार पर स्वीकृति वापस ले ली गई, तो इन निर्णयों का आधार क्या था? क्या इन फैसलों के पीछे विधिक परीक्षण समान था? क्या सभी मामलों में एक समान मानक अपनाए गए? इन प्रश्नों का उत्तर केवल स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कैग ने दोनों मामलों में प्रशासनिक निर्णयों पर गंभीर टिप्पणियां दर्ज करते हुए जिम्मेदारी तय करने की बात कही है। इसके बावजूद अब तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि तत्कालीन जिला खनन पदाधिकारी, तत्कालीन उपायुक्त या अन्य संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कोई विभागीय जांच शुरू हुई या नहीं।
साहिबगंज की खनन व्यवस्था पर देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था द्वारा उठाए गए ये प्रश्न अब केवल फाइलों तक सीमित नहीं हैं। वे प्रशासनिक पारदर्शिता, समानता के सिद्धांत और प्राकृतिक संसाधनों के निष्पक्ष प्रबंधन से जुड़े हैं। अब यह जिम्मेदारी राज्य सरकार की है कि वह कैग की टिप्पणियों को केवल रिकॉर्ड का हिस्सा न मानकर उनकी निष्पक्ष जांच कराए और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय करे। इससे ही यह स्पष्ट होगा कि कानून सभी के लिए समान है या नहीं।
ये भी पढ़ें: Sahibganj में मुहर्रम पर निकले ताजिया और अखाड़ा जुलूस, पारंपरिक लाठी-खेल व करतबों ने मोहा मन






