Sahibganj में खनन घोटाला: नियमों को ताक पर रखकर कैसे बांटी गईं खदानें? CAG रिपोर्ट ने खोली प्रशासनिक खेल की परतें

Mining Scam in Sahibganj: How were mines allocated in blatant disregard of rules? CAG report exposes the layers of administrative maneuvering.

Sahibganj: साहिबगंज में वर्षों से चल रहे पत्थर खनन कारोबार को लेकर जो चर्चाएं आम लोगों और सामाजिक संगठनों के बीच होती रही थीं, अब उन चर्चाओं को भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने आधिकारिक आधार दे दिया है। रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों से स्पष्ट होता है कि जिले में खनन पट्टों के आवंटन और नवीकरण की प्रक्रिया में नियमों का पालन करने के बजाय उन्हें दरकिनार करने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है।

कैग (CAG) ने अपनी ऑडिट जांच में पाया कि झारखंड माइनर मिनरल कंसेशन (JMMC) नियमावली में मार्च 2017 के संशोधन के बाद पांच हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल की रैयती भूमि पर खनन पट्टा केवल ई-नीलामी के माध्यम से दिया जाना था। इसके बावजूद साहिबगंज में 6.026 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली एक पत्थर खदान का नवीकरण अक्टूबर 2017 में तत्कालीन उपायुक्त की स्वीकृति से कर दिया गया। रिपोर्ट स्पष्ट रूप से कहती है कि उपायुक्त ऐसे पट्टे के नवीकरण के लिए सक्षम प्राधिकारी नहीं थे।

इस एक फैसले ने न केवल नियमों का उल्लंघन किया बल्कि राज्य सरकार को ई-नीलामी से मिलने वाले संभावित अधिक राजस्व से भी वंचित कर दिया। सवाल यह है कि जब नियम स्पष्ट थे तो फिर उपायुक्त कार्यालय ने ऐसा निर्णय किस आधार पर लिया? क्या जिला खनन कार्यालय ने इस संबंध में कानूनी राय ली थी? यदि ली थी, तो वह क्या थी, और यदि नहीं ली थी, तो इतनी बड़ी प्रक्रिया किस आधार पर पूरी कर दी गई?

कैग (CAG) रिपोर्ट केवल एक मामले तक सीमित नहीं है। ऑडिट में यह भी पाया गया कि साहिबगंज जिले में कई खनन पट्टों के आवेदन अधूरे दस्तावेजों के बावजूद स्वीकार किए गए। उदाहरण के तौर पर ओ.पी. स्टोन वर्क्स, मां रक्षी स्टोन वर्क्स, एस.बी. स्टोन वर्क्स, मीनाक्षी स्टोन वर्क्स, महारानी स्टोन वर्क्स, मीरा पहाड़ स्टोन माइंस, अभि स्टोन वर्क्स, महाकाल स्टोन वर्क्स, आर.बी. स्टोन वर्क्स, काशी बिल्डर्स एंड सर्विस प्राइवेट लिमिटेड तथा श्री गुरु स्टोन वर्क्स जैसे आवेदनों में शपथपत्रों की अनिवार्य शर्तें पूरी नहीं थीं। कई मामलों में रॉयल्टी क्लीयरेंस सर्टिफिकेट तक संलग्न नहीं था, फिर भी आवेदन प्रक्रिया आगे बढ़ती रही।

कैग (CAG) ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि कई शपथपत्रों में नियम 9(1)(ज)(6) और 9(1)(ज)(7) की आवश्यक घोषणाएं अधूरी थीं। कई आवेदनों में रॉयल्टी क्लीयरेंस प्रमाणपत्र अनुपस्थित था। इसके बावजूद जिला खनन कार्यालय द्वारा दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई।

ऑडिट रिपोर्ट का सबसे गंभीर निष्कर्ष यह है कि राज्य में ऐसा कोई प्रभावी तंत्र नहीं था जिससे यह सत्यापित किया जा सके कि आवेदनकर्ता के ऊपर पहले से खनन संबंधी बकाया राशि तो नहीं है। परिणामस्वरूप ऐसे लोगों को भी नए पट्टे मिल गए जिनकी पात्रता की स्वतंत्र जांच नहीं की गई थी।

साहिबगंज में खनन उद्योग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का भी केंद्र रहा है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या जिला प्रशासन और जिला खनन कार्यालय ने जानबूझकर नियमों को नजरअंदाज किया या फिर यह प्रशासनिक अक्षमता का परिणाम था? कैग (CAG) रिपोर्ट इन सवालों का सीधा जवाब तो नहीं देती, लेकिन यह अवश्य कहती है कि जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

अब निगाहें राज्य सरकार पर हैं। क्या कैग (CAG) की इस रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन उपायुक्त, जिला खनन पदाधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा? साहिबगंज की जनता इस सवाल का जवाब जानना चाहती है।

(Note: तस्वीर वास्तविक नहीं है, AI जनरेटेड है।)

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WASIM AKRAM
Author: WASIM AKRAM

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