DMFT का भटका एजेंडा: Sahibganj में 2023-24 में भी कंक्रीट भारी; पर्यावरण, महिला-बाल कल्याण और स्वच्छता पूरी तरह गायब

DMFT's misguided agenda: Concrete projects dominate in Sahibganj even in 2023-24; environment, women and child welfare, and sanitation are completely neglected.

Sahibganj: डीएमएफटी (DMFT) साहिबगंज के वित्तीय वर्ष 2023-24 के वार्षिक प्रतिवेदन ने तत्कालीन जिला प्रशासन की प्राथमिकताओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रतिवेदन के पन्ना संख्या 11 और 12 में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के अंतर्गत स्वीकृत और पूर्ण कार्यों का जो ब्योरा सामने आया है, वह यह साफ दर्शाता है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों की बुनियादी जरूरतें लगातार उपेक्षित की जा रही हैं, जबकि फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर लगातार बढ़ता गया है।

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2022-23 में पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी 17 योजनाएं स्वीकृत की गई थीं, लेकिन 2023-24 में इस मद में एक भी योजना का चयन नहीं किया गया। यही स्थिति महिला एवं बाल कल्याण एवं विकास की रही। 2022-23 में इस मद में एक योजना चयनित तो हुई, लेकिन वह भी पूर्ण नहीं हो सकी, जबकि 2023-24 में महिला एवं बाल कल्याण पूरी तरह जिला प्रशासन की प्राथमिकता से बाहर हो गया। स्वच्छता के क्षेत्र में भी हालात बेहद चिंताजनक रहे और 2023-24 वित्तीय वर्ष में एक भी योजना चयनित नहीं की गई।

इन परिस्थितियों में यह कहना गलत नहीं होगा कि डीएमएफटी (DMFT) की तत्कालीन साहिबगंज जिला समिति के लिए लोगों की प्राथमिक जरूरतों से ज्यादा अतिरिक्त जरूरतें और कंक्रीट आधारित फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर अधिक महत्वपूर्ण बन गई थीं। यही वजह रही कि जहां उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में केवल 139 योजनाएं चयनित की गईं, वहीं अकेले अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र में फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की 84 योजनाओं को मंजूरी दे दी गई।

वित्तीय वर्ष 2023-24 में उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र में ड्रिंकिंग वाटर से संबंधित केवल 19 योजनाओं का चयन हुआ, जिनके लिए 318.334 लाख रुपये स्वीकृत किए गए, लेकिन खर्च महज 108.414 लाख रुपये ही हो सका। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए शून्य योजना, महिला एवं बाल कल्याण के लिए शून्य योजना और स्वच्छता के लिए भी शून्य योजना चयनित की गई। स्वास्थ्य देखभाल की सिर्फ दो योजनाओं में 326.115 लाख रुपये की स्वीकृति के मुकाबले 68.436 लाख रुपये ही खर्च हुए। शिक्षा के क्षेत्र में 98 योजनाओं के लिए 3131.821 लाख रुपये स्वीकृत किए गए, लेकिन खर्च केवल 573.83 लाख रुपये तक सीमित रहा। कुल मिलाकर उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र में 139 योजनाओं के लिए 4335.456 लाख रुपये स्वीकृत हुए, जबकि वास्तविक खर्च 1111.621 लाख रुपये ही किया गया।

इसके उलट अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र में फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की 89 योजनाओं के लिए 2509.187 लाख रुपये स्वीकृत किए गए, जिनमें से 822.784 लाख रुपये खर्च कर दिए गए। इससे यह साफ हो जाता है कि 2023-24 में भी तत्कालीन जिला प्रशासन की प्राथमिकता उच्च प्राथमिकता वाले सामाजिक और पर्यावरणीय क्षेत्रों के बजाय कंक्रीट आधारित निर्माण कार्य ही रहे।

इन आंकड़ों ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जिला प्रशासन कब तक खनन प्रभावितों के साथ ऐसा व्यवहार करता रहेगा। कब तक प्रदूषण से जूझ रहे लोग, महिलाएं व बच्चे, और बुनियादी सुविधाओं से वंचित गांव उपेक्षित महसूस करते रहेंगे। यह भी सवाल है कि जब पीएमकेकेकेवाय के नियम स्पष्ट रूप से उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर ज़्यादा फंड खर्च करने की बात कहते हैं, तो उनका पूर्ण पालन कब होगा?

सबसे अहम सवाल यह है कि डीएमएफटी फंड के उपयोग का सही, समयबद्ध और सटीक लेखा-जोखा आखिर कब सार्वजनिक किया जाएगा? नियम यह बताते हैं कि हर वित्तीय वर्ष की समाप्ति के तीन माह के भीतर वार्षिक प्रतिवेदन और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक कर उन्हें विधानसभा के समक्ष भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या तत्कालीन अधिकारियों की अनदेखियों को आगे भी दोहराया जाएगा या फिर वर्तमान में व्यवस्था में सुधार कर खनन प्रभावित समुदायों तक डीएमएफटी का वास्तविक लाभ पहुंचाया जाएगा। वहीं जिला प्रशासन अगर यह दावा करता है कि डीएमएफटी फण्ड का उपयोग पीएमकेकेकेवाय के निर्धारित नियमों के अनुसार हो रहा है तो जिला प्रशासन द्वारा सम्बंधित जानकारी उपलब्ध कराये जाने पर प्रमुखता से प्रकाशित की जायेगी।

ये भी पढ़ें: डीएमएफटी फंड का उल्टा गणित: Sahibganj में उच्च प्राथमिकता उपेक्षित, कंक्रीट कार्यों पर बहाया गया पैसा

WASIM AKRAM
Author: WASIM AKRAM

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