Sahibganj का खनन सिंडिकेट: क्या अफसरों की मेहरबानी से फलता-फूलता रहा पत्थर साम्राज्य?

Sahibganj's Mining Syndicate: Did the Stone Empire Flourish Thanks to the Patronage of Officials?
  • खनन से टूटी सड़कें, बिगड़ा पर्यावरण लेकिन जवाबदेही शुन्य, Sahibganj खनन मॉडल पर कैग की कड़ी टिप्पणी

Sahibganj: खनन पट्टों के आवंटन और अधूरे दस्तावेजों पर स्वीकृतियों की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। कैग की रिपोर्ट (2025) का सबसे विस्फोटक हिस्सा वह है, जिसमें पूरे खनन तंत्र की निगरानी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि यदि नियमों का पालन होता, नियमित निरीक्षण किए जाते और जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारियां निभाता, तो झारखंड में खनन क्षेत्र से जुड़े कई बड़े विवाद शायद कभी जन्म ही नहीं लेते। साहिबगंज जैसे जिले में, जहां खनन उद्योग पूरे प्रशासनिक ढांचे को प्रभावित करता है, यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है।

कैग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि राज्य के खनन विभाग और जिला खनन कार्यालयों द्वारा खदानों की निगरानी और निरीक्षण की व्यवस्था बेहद कमजोर पाई गई। कई स्थानों पर खनन योजनाओं में निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया गया, लेकिन संबंधित अधिकारियों द्वारा समय रहते कार्रवाई नहीं की गई। रिपोर्ट के अनुसार निरीक्षण और मापी की प्रक्रिया प्रभावी नहीं थी, जिसके कारण वास्तविक खनन और अभिलेखों में दर्ज उत्पादन के बीच अंतर की संभावना बनी रही।

ऑडिट के दौरान यह भी पाया गया कि कई खदानों में माइनिंग प्लान के अनुसार बेंच (Bench) और सुरक्षा अवरोधक नहीं बनाए गए थे। जिन खदानों में 45 डिग्री ढलान बनाए रखने का प्रावधान था, वहां 65 से 90 डिग्री तक की खड़ी ढलानों पर खनन किया गया। कई जगहों पर निर्धारित सीमा से अधिक गहराई तक खुदाई होने के संकेत मिले। इसका सीधा अर्थ यह है कि खनिज संसाधनों का दोहन खनन योजना के विपरीत किया गया और पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों की अनदेखी हुई।

Sahibganj's Mining Syndicate: Did the Stone Empire Flourish Thanks to the Patronage of Officials?
ऑडिट रिपोर्ट चार्ट 4.3

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि खदानों में नियमों का उल्लंघन हो रहा था तो तत्कालीन जिला खनन पदाधिकारी और निरीक्षण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की? रिपोर्ट बताती है कि विभागीय अधिकारियों को नियमित मापी और सत्यापन करना था, लेकिन निगरानी तंत्र अपेक्षित स्तर पर कार्य नहीं कर पाया। परिणामस्वरूप खनन गतिविधियों की वास्तविक स्थिति और सरकारी अभिलेखों में दर्ज आंकड़ों के बीच अंतर की आशंका बनी रही।

कैग ने परिवहन व्यवस्था को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां की हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 72 हजार से अधिक खनिज परिवहन वाहनों का पंजीकरण किया गया था, लेकिन इनमें से किसी में भी जीपीएस या आरएफआईडी आधारित ट्रैकिंग व्यवस्था लागू नहीं की गई। ऐसे में यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव था कि खनिजों का परिवहन नियमों के अनुरूप हो रहा है या नहीं। रिपोर्ट कहती है कि केवल चालान आधारित व्यवस्था के भरोसे पूरे परिवहन तंत्र को छोड़ दिया गया, जिससे अवैध परिवहन और ओवरलोडिंग पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सका।

साहिबगंज जिले में यह टिप्पणी विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यहां से प्रतिदिन हजारों टन स्टोन चिप्स और बोल्डर रेल, सड़क और जलमार्ग तीनों के माध्यम से बाहर भेजे जाते हैं। यदि परिवहन व्यवस्था की निगरानी कमजोर हो, तो राजस्व क्षति और अवैध खनन की संभावनाएं स्वतः बढ़ जाती हैं।

रिपोर्ट ने ग्रामीण सड़कों की स्थिति को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। ऑडिट के दौरान पाया गया कि भारी खनन वाहनों के लगातार परिचालन से कई सड़कें समय से पहले क्षतिग्रस्त हो गईं। कैग ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि साहिबगंज समेत कई खनन प्रभावित जिलों में खदानों और क्रशर क्षेत्रों के आसपास सड़कें बुरी तरह प्रभावित हुईं। इसके बावजूद क्षतिग्रस्त सार्वजनिक परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण और संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था नहीं बनाई गई।

ऑडिट के दौरान ग्रामीणों और स्थानीय निवासियों से प्राप्त प्रतिक्रियाएं भी चिंताजनक थीं। बड़ी संख्या में लोगों ने शिकायत की कि खनन गतिविधियों के कारण पर्यावरणीय क्षति, कृषि भूमि पर असर, जलस्तर में गिरावट और सड़कों का नुकसान हुआ है। कई लोगों ने यह भी कहा कि खनन कंपनियों द्वारा क्षेत्र में पर्याप्त पुनर्वास या पुनर्स्थापन कार्य नहीं किए गए।

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका निष्कर्ष और सिफारिशें हैं। कैग ने राज्य सरकार को स्पष्ट रूप से सलाह दी है कि जिन अधिकारियों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए खनन पट्टों के आवंटन, नवीकरण या भूमि की प्रकृति के संबंध में गलत निर्णय लिए, उनकी जिम्मेदारी तय की जाए। रिपोर्ट ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना खनन क्षेत्र में पारदर्शिता स्थापित नहीं की जा सकती।

कैग ने यह भी अनुशंसा की है कि खनन पट्टों के लिए भूमि अभिलेखों को ऑनलाइन रिकॉर्ड से जोड़ा जाए, अवैध खनन की पहचान के लिए ड्रोन सर्वे कराया जाए, परिवहन व्यवस्था को जीपीएस आधारित बनाया जाए, और खनन गतिविधियों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाए। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिन अधिकारियों ने नियमों का उल्लंघन किया, उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

साहिबगंज में खनन उद्योग लंबे समय से आर्थिक गतिविधियों का केंद्र रहा है, लेकिन कैग की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही की कमी ने इस पूरे तंत्र को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन अनियमितताओं की पुष्टि देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था ने की है, क्या उन पर कार्रवाई होगी? क्या तत्कालीन जिला प्रशासन, जिला खनन कार्यालय और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर यह रिपोर्ट भी अन्य सरकारी दस्तावेजों की तरह फाइलों में दफन होकर रह जाएगी?

साहिबगंज की खनन व्यवस्था पर उठे सवाल केवल कुछ खदानों या कुछ फाइलों तक सीमित नहीं हैं। सवाल पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर है। और जब सवाल सिस्टम पर हो, तो जवाब भी सिस्टम को ही देना पड़ता है।

(Note: मुख्य तस्वीर वास्तविक नहीं है, AI जनरेटेड है।)

ये भी पढ़ें: फाइलों में झोल, फिर भी मिली खदान! Sahibganj में तत्कालीन पदाधिकारियों के संरक्षण में चल रहा था लीज मंजूरी का खेल?

WASIM AKRAM
Author: WASIM AKRAM

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