Sahibganj: अगर कोई आम नागरिक जमीन की रसीद, जाति प्रमाण पत्र या अन्य सरकारी दस्तावेजों में एक छोटी सी त्रुटि कर दे तो महीनों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। लेकिन साहिबगंज में पत्थर खनन पट्टों की स्वीकृति के मामले में तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि जिले में कई खनन पट्टों के आवेदन ऐसे दस्तावेजों के आधार पर स्वीकार किए गए जिनमें गंभीर कानूनी कमियां मौजूद थीं। इसके बावजूद फाइलें आगे बढ़ीं, प्रक्रियाएं पूरी हुईं और खदानें आवंटित होती रहीं।
कैग (CAG) की जांच में सामने आया कि जिला खनन कार्यालय द्वारा कई मामलों में आवेदन पत्रों की समुचित जांच ही नहीं की गई। परिणामस्वरूप ऐसे आवेदन भी स्वीकृति की प्रक्रिया में शामिल हो गए जिनमें नियमों के तहत आवश्यक दस्तावेज मौजूद नहीं थे।
रिपोर्ट के अनुसार साहिबगंज जिले में सुदारे मौजा स्थित सात एकड़ क्षेत्र के लिए आवेदन करने वाली एम/एस ओ.पी. स्टोन वर्क्स की फाइल में केवल एक शपथपत्र संलग्न था। ऑडिट में पाया गया कि शपथपत्र में नियम 9(1)(ज)(7) के सभी अनिवार्य बिंदु शामिल नहीं थे और रॉयल्टी क्लीयरेंस सर्टिफिकेट भी उपलब्ध नहीं था। इसके बावजूद आवेदन प्रक्रिया आगे बढ़ी।
इसी प्रकार भुताहा मौजा में 3.15 एकड़ क्षेत्र के लिए आवेदन करने वाली एम/एस मां रक्षी स्टोन वर्क्स की फाइल में भी नियम 9(1)(ज)(6) के अनुरूप पूर्ण शपथपत्र नहीं पाया गया। दस्तावेजों में कमी होने के बावजूद आवेदन स्वीकार किया गया।
पिपरजोरी मौजा की 12.10 एकड़ भूमि के लिए आवेदन करने वाली एम/एस एस.बी. स्टोन वर्क्स की फाइल भी ऑडिट जांच के दायरे में आई। इसी तरह डेम्बा मौजा में 10 एकड़ क्षेत्र के लिए आवेदन करने वाली एम/एस मीनाक्षी स्टोन वर्क्स की फाइल में केवल एक शपथपत्र पाया गया। कैग ने पाया कि शपथपत्र में नियमों के अनुरूप सभी घोषणाएं नहीं थीं और रॉयल्टी क्लीयरेंस प्रमाणपत्र भी उपलब्ध नहीं था।
डेम्बा मौजा की ही 8.10 एकड़ भूमि के लिए आवेदन करने वाली एम/एस महारानी स्टोन वर्क्स की फाइल भी इसी प्रकार की कमियों से घिरी हुई थी। वहीं मीरापहाड़ मौजा में नौ एकड़ क्षेत्र के लिए आवेदन करने वाली एम/एस मीरा पहाड़ स्टोन माइंस की फाइल में यद्यपि रॉयल्टी क्लीयरेंस प्रमाणपत्र संलग्न था, लेकिन शपथपत्र नियमों के अनुरूप पूर्ण नहीं पाया गया।
रोहरे मौजा में 12 एकड़ क्षेत्र के लिए आवेदन करने वाली एम/एस अभि स्टोन वर्क्स की फाइल में भी वही कहानी दोहराई गई। शपथपत्र अधूरा था और रॉयल्टी क्लीयरेंस प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था। गिलमारी मौजा की 6.25 एकड़ भूमि के लिए एम/एस महाकाल स्टोन वर्क्स, मयूरकोला मौजा की 11.25 एकड़ भूमि के लिए एम/एस आर.बी. स्टोन वर्क्स, जोकमारी मौजा की सात एकड़ भूमि के लिए एम/एस काशी बिल्डर्स एंड सर्विस प्राइवेट लिमिटेड तथा धतापाड़ा मौजा की 10.57 एकड़ भूमि के लिए एम/एस श्री गुरु स्टोन वर्क्स के मामलों में भी दस्तावेजी कमियां ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इन फाइलों में आवश्यक शर्तें पूरी नहीं थीं तो उन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकृत क्यों नहीं किया गया? जिला खनन कार्यालय का दायित्व था कि वह प्रत्येक आवेदन की तकनीकी और कानूनी जांच करे, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि कई मामलों में यह जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित रह गई और इनमें से ज़्यादातर पत्थर खदानें आज भी बिना रोक-टोक संचालित हैं।
कैग (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में एक और गंभीर खामी उजागर की है। नियम 9(5) के अनुसार प्रत्येक आवेदक को अपने पुराने खनन पट्टों से संबंधित रॉयल्टी क्लीयरेंस प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना आवश्यक था। लेकिन राज्य सरकार के पास ऐसा कोई केंद्रीकृत तंत्र ही नहीं था जिससे यह सत्यापित किया जा सके कि आवेदक पहले से किसी अन्य जिले में खनन पट्टा धारक है या उसके ऊपर रॉयल्टी बकाया है। इस कमजोरी का लाभ उठाकर कई आवेदक नई लीज प्राप्त करने में सफल रहे।
रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि जिला खनन कार्यालयों में दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया प्रभावी नहीं थी। यदि प्रारंभिक स्तर पर ही नियमों का कठोरता से पालन किया जाता तो कई विवादित फाइलें स्वीकृति की प्रक्रिया तक पहुंच ही नहीं पातीं।
साहिबगंज में वर्षों से यह चर्चा होती रही है कि खनन उद्योग के कुछ प्रभावशाली खिलाड़ियों को प्रशासनिक स्तर पर विशेष संरक्षण प्राप्त था। कैग (CAG) रिपोर्ट भले ही सीधे किसी व्यक्ति का नाम लेकर ऐसा आरोप नहीं लगाती, लेकिन रिपोर्ट में दर्ज तथ्य यह अवश्य दर्शाते हैं कि नियमों की अनदेखी कोई अपवाद नहीं बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा प्रतीत होती है।
अब सवाल केवल दस्तावेजों की कमी का नहीं है। असली सवाल यह है कि इन अधूरी फाइलों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या संबंधित अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी की, या फिर कुछ प्रभावशाली हितों के दबाव में आंखें मूंद ली गईं? कैग (CAG) ने जवाबदेही तय करने की सिफारिश की है। अब देखना यह है कि प्रशासनिक तंत्र उन सिफारिशों को अमल में लाती है या नहीं।







