मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, लेकिन इसकी दसवीं तारीख यानी आशूरा पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए गहरे ग़म, सब्र और कुर्बानी का दिन मानी जाती है। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि इंसाफ, सच्चाई और इंसानियत की ऐसी मिसाल है, जिसे सदियां बीत जाने के बाद भी दुनिया भूल नहीं सकी। करबला की धरती पर जो कुछ हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि तलवारें जिस्म को खत्म कर सकती हैं, लेकिन सच और ईमान की आवाज़ को कभी नहीं दबा सकतीं।
पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने नवासों इमाम हसन और इमाम हुसैन से बेहद मोहब्बत करते थे। हदीसों में आता है कि वे उन्हें अपने कंधों पर बैठाते, सीने से लगाते और फरमाते थे कि “हसन और हुसैन जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं।” लेकिन वक्त का फैसला कुछ और था। पैगम्बर ﷺ के इंतकाल के कुछ दशक बाद इस्लामी दुनिया राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रही थी। हजरत मुआविया की मृत्यु के बाद उनके पुत्र यज़ीद ने सत्ता संभाली और सभी प्रमुख मुस्लिम नेताओं से अपनी बैअत यानी निष्ठा की शपथ लेने की मांग की। इमाम हुसैन ने यह कहते हुए बैअत से इनकार कर दिया कि अन्याय और अत्याचार का समर्थन करना इस्लाम की शिक्षा नहीं है। उन्होंने सत्ता के बजाय सत्य का रास्ता चुना।
मुहर्रम का चांद निकल चुका था। इमाम हुसैन अपने परिवार, महिलाओं, बच्चों और लगभग 72 वफादार साथियों के साथ कूफा की ओर बढ़ रहे थे। एक मुहर्रम के आसपास उनका काफिला उस रास्ते पर पहुंचा, जहां यज़ीद की सेना ने उन्हें रोक लिया। उन्हें कूफा जाने की अनुमति नहीं दी गई और करबला की ओर बढ़ने के लिए मजबूर किया गया। दो मुहर्रम, 61 हिजरी को इमाम हुसैन का काफिला करबला के तपते रेगिस्तान में पहुंचा। दूर बहती फरात नदी दिखाई दे रही थी, लेकिन यह पानी जल्द ही उनके लिए बंद कर दिया जाने वाला था।
तीन, चार, पांच और छह मुहर्रम के बीच यज़ीद की सेना लगातार बढ़ती रही। हजारों सैनिकों ने केवल 72 लोगों के छोटे से काफिले को चारों ओर से घेर लिया। बार-बार संदेश भेजा गया कि यदि इमाम हुसैन यज़ीद की बैअत कर लें, तो उन्हें जाने दिया जाएगा। लेकिन हर बार उनका जवाब एक ही था “मैं ज़ुल्म के सामने सिर नहीं झुकाऊंगा।” करबला का मैदान अब एक ऐसे संघर्ष का गवाह बनने वाला था, जिसमें संख्या नहीं बल्कि सिद्धांत की ताकत दिखाई देने वाली थी।
सात मुहर्रम का दिन करबला की सबसे दर्दनाक शुरुआत लेकर आया। यज़ीद की सेना ने फरात नदी का पानी पूरी तरह बंद कर दिया। अब न बच्चों को पानी मिल सकता था, न महिलाओं को, न बुजुर्गों को और न ही इमाम हुसैन के साथियों को। तपती रेत पर तंबुओं के भीतर मासूम बच्चों के होंठ सूखने लगे। उनकी जुबान से बार-बार केवल एक आवाज निकल रही थी “अल-अतश… अल-अतश…” यानी “पानी… पानी…”। लेकिन सत्ता के नशे में चूर सेना का दिल नहीं पसीजा।
आठ मुहर्रम तक प्यास असहनीय हो चुकी थी। तंबुओं में पानी की एक बूंद भी नहीं बची थी। बच्चे बिलख रहे थे, माताएं उन्हें सीने से लगाकर ढांढस बंधा रही थीं और हर चेहरा अल्लाह से मदद की दुआ कर रहा था। लेकिन इमाम हुसैन ने अपने साथियों का हौसला टूटने नहीं दिया। उन्होंने कहा कि यह परीक्षा का समय है और अल्लाह सब कुछ देख रहा है।
नौ मुहर्रम की शाम यज़ीद की सेना ने अंतिम हमला करने का फैसला कर लिया। इमाम हुसैन ने केवल एक रात की मोहलत मांगी ताकि वे और उनके साथी पूरी रात इबादत कर सकें। वह रात इतिहास की सबसे भावुक रातों में गिनी जाती है। इमाम हुसैन ने अपने साथियों से कहा कि अंधेरे का फायदा उठाकर जो जाना चाहे, चला जाए, क्योंकि दुश्मनों को केवल मेरी जान चाहिए। लेकिन कोई भी उनका साथ छोड़कर नहीं गया। हर साथी ने कहा कि अगर सौ बार भी जान देनी पड़े तो भी वे इमाम हुसैन को अकेला नहीं छोड़ेंगे। पूरी रात कुरआन की तिलावत, नमाज और दुआओं में गुजरी।
फिर आया दस मुहर्रम, आशूरा का दिन। सूरज उगा तो करबला की रेत पर इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय लिखा जाने लगा। युद्ध शुरू हुआ और इमाम हुसैन के साथी एक-एक करके शहीद होते गए। उनके भतीजे, भांजे, बेटे, रिश्तेदार और दोस्त सभी ने बारी-बारी से अपनी जान कुर्बान कर दी। लेकिन किसी ने भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा।
जब बच्चों की प्यास असहनीय हो गई तो हजरत अब्बास पानी लाने के लिए फरात नदी की ओर बढ़े। उन्होंने मशक में पानी भर लिया, लेकिन लौटते समय उनके दोनों हाथ काट दिए गए। तीरों से मशक फट गई और पानी रेत में बह गया। तंबुओं में बैठे प्यासे बच्चों तक पानी की एक बूंद भी नहीं पहुंच सकी।
करबला का सबसे हृदयविदारक दृश्य तब सामने आया जब इमाम हुसैन अपने छह महीने के मासूम बेटे अली असगर को गोद में लेकर दुश्मन की सेना के सामने पहुंचे। उन्होंने कहा कि यदि मुझसे दुश्मनी है तो इस मासूम पर रहम करो और इसे एक घूंट पानी दे दो। लेकिन जवाब में एक तीर छोड़ा गया, जो सीधे उस मासूम बच्चे के गले में आकर लगा। एक पिता की गोद में उसका छह महीने का बेटा तड़पकर शहीद हो गया। यह घटना आज भी सुनने वालों की आंखें नम कर देती है।
आखिरकार वह क्षण भी आया जब इमाम हुसैन अकेले रह गए। तीन दिनों की प्यास, भूख, थकान और अपनों की शहादत का दर्द उनके सामने था, लेकिन उनके चेहरे पर शिकन नहीं थी। उन्होंने आखिरी बार सज्दा किया और अल्लाह से दुआ की। इसके बाद उन्हें भी शहीद कर दिया गया। इतिहास में दर्ज है कि उनकी शहादत के बाद उनके परिवार की महिलाओं और बच्चों को कैदी बना लिया गया, तंबुओं में आग लगा दी गई और उन्हें कूफा तथा दमिश्क ले जाया गया। लेकिन इमाम हुसैन की बहन हजरत ज़ैनब ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए करबला का संदेश दुनिया तक पहुंचाया और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद की।
करबला की यह घटना केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए एक संदेश है। यह बताती है कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, यदि वह अन्याय पर आधारित है तो उसका विरोध करना ही सच्चे ईमान की पहचान है। इमाम हुसैन ने हमें सिखाया कि जीवन से बड़ा सत्य होता है, शक्ति से बड़ा सिद्धांत होता है और डर से बड़ी इंसान की आत्मा होती है।
आज जब भी दस मुहर्रम आता है, दुनिया भर में करोड़ों लोग करबला के शहीदों को याद करते हैं। कोई रोजा रखता है, कोई दुआ करता है, कोई मजलिस में बैठकर करबला की दास्तान सुनता है और कोई इंसाफ और इंसानियत के लिए इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करके अपनी आंखें नम कर लेता है।
करबला की रेत आज भी यही कहती है कि शहादत हार नहीं होती, बल्कि सत्य की सबसे बड़ी जीत होती है। इमाम हुसैन का सिर तो कट गया, लेकिन उनका संदेश आज भी पूरी दुनिया को यह सिखाता है कि ज़ुल्म के सामने कभी सिर नहीं झुकाना चाहिए। यही करबला का पैगाम है, यही आशूरा का संदेश है और यही इंसानियत की सबसे अमर विरासत है।
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