भारतीय राजनीति में पोस्टर और प्रतीक हमेशा से विचारधाराओं के संघर्ष का सशक्त माध्यम रहे हैं। चुनावी सभाओं के भाषण भले कुछ समय बाद लोगों की स्मृति से धुंधले पड़ जाएं, लेकिन एक प्रभावशाली पोस्टर कई दिनों तक राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रहता है। हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) त्रिपुरा के आधिकारिक सोशल मीडिया मंच पर जारी एक पोस्टर ने ठीक ऐसा ही किया है।
त्रिपुरा कांग्रेस (Congress) द्वारा साझा किए गए इस पोस्टर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उद्योगपति गौतम अडानी और मुकेश अंबानी को ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की वेशभूषा में दर्शाया गया है। पोस्टर के केंद्र में बड़े अक्षरों में “WEST INDIA COMPANY” लिखा गया है, जबकि ऊपर “Looting Since 2014” और “Using Divide and Rule” जैसे वाक्यांश भी अंकित हैं। दृश्य संरचना स्पष्ट रूप से ऐतिहासिक ईस्ट इंडिया कंपनी की याद दिलाती है, जिसने व्यापार के बहाने भारत में प्रवेश कर लगभग दो शताब्दियों तक ब्रिटिश शासन की नींव रखी थी।
त्रिपुरा कांग्रेस (Congress) का यह पोस्टर महज एक ग्राफिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान और बड़े कॉरपोरेट घरानों के रिश्तों पर एक तीखा राजनीतिक आरोप है। पार्टी का संदेश यह प्रतीत होता है कि जिस प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के संसाधनों, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना का दोहन किया था, उसी प्रकार आज देश में सत्ता और पूंजीपति का गठजोड़ लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा राष्ट्रीय संपत्तियों पर प्रभाव स्थापित कर रहा है।
पोस्टर में प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को ब्रिटिश गवर्नरों जैसी वेशभूषा में दिखाकर कांग्रेस यह संकेत देने की कोशिश करती दिखती है कि भाजपा सरकार की नीतियां आम जनता के बजाय चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। वहीं अडानी और अंबानी की तस्वीरों को उसी औपनिवेशिक प्रतीकात्मकता में शामिल कर यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि देश की आर्थिक नीतियों का लाभ कुछ सीमित औद्योगिक घरानों तक सिमटता जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार कांग्रेस ने इस पोस्टर के माध्यम से दो बड़े मुद्दों को एक साथ साधने की कोशिश की है। पहला, भाजपा सरकार पर कॉरपोरेट पक्षधरता का आरोप और दूसरा, सामाजिक व राजनीतिक ध्रुवीकरण को “डिवाइड एंड रूल” यानी “फूट डालो और राज करो” की ब्रिटिश नीति से जोड़ना। कांग्रेस लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि केंद्र सरकार सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निजीकरण और नीतिगत फैसलों के माध्यम से कुछ बड़े उद्योग समूहों को लाभ पहुंचा रही है। पोस्टर उसी आरोप को दृश्य रूप में प्रस्तुत करता है।

हालांकि भाजपा और उसके समर्थक इस प्रकार के पोस्टरों को राजनीतिक हताशा और दुष्प्रचार करार देते रहे हैं। भाजपा का तर्क रहा है कि पिछले एक दशक में भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ है, बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है और देश ने वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति मजबूत की है। ऐसे में सरकार की तुलना औपनिवेशिक शासकों से करना न केवल अनुचित है बल्कि स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों का भी अपमान है।
फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस का यह पोस्टर राजनीतिक संचार की दृष्टि से प्रभावशाली माना जा रहा है। इतिहास के सबसे संवेदनशील अध्याय ब्रिटिश उपनिवेशवाद को वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से जोड़ना एक ऐसा प्रतीकात्मक प्रयोग है जो समर्थकों और विरोधियों दोनों के बीच तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यही कारण है कि पोस्टर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।
भारतीय राजनीति में प्रतीकों की लड़ाई नई नहीं है। कभी “चौकीदार”, कभी “तानाशाह”, कभी “सूट-बूट की सरकार” और अब “वेस्ट इंडिया कंपनी” जैसे राजनीतिक रूपक जनता के बीच धारणा निर्माण का माध्यम बनते रहे हैं। कांग्रेस के इस पोस्टर ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि डिजिटल युग में राजनीतिक संघर्ष केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक तस्वीर भी हजारों शब्दों के बराबर असर पैदा कर सकती है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह हमला केवल सोशल मीडिया की बहस बनकर रह जाता है या फिर भाजपा और विपक्ष के बीच कॉरपोरेट-सत्ता संबंधों पर एक बड़े राजनीतिक विमर्श का आधार तैयार करता है। फिलहाल इतना तय है कि “वेस्ट इंडिया कंपनी” का यह पोस्टर भारतीय राजनीति के दृश्य-प्रचार अभियान में एक नए और विवादास्पद अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है।
ये भी पढ़ें: Rajmahal पुलिस की बड़ी सफलता: ड्रग नेटवर्क पर कसा शिकंजा, 13.7 ग्राम एमडीएमए के साथ दो तस्कर गिरफ्तार







